Dhar Bhojshala: कौन थे कमाल मौला, जिनके नाम पर धार का भोजशाला बन गया दरगाह? जानिए इस विवाद का पूरा सच

Kamal Maula In Bhojshala Case: धार भोजशाला मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट के फैसले के बाद कमाल मौला चर्चा में हैं। आइए इनके बारे में जानते हैं।
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कौन थे कमाल मौला? (कॉन्सेप्ट फोटो- AI)
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Who is Kamal Maula In Bhojshala Case: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने धार के भोजशाला परिसर मामले में आज शुक्रवार, 15 मई को एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने इस विवादित परिसर को ‘वाग्देवी सरस्वती मंदिर’ करार दिया है। मुस्लिम पक्ष की ओर इस परिसर को लेकर दावा किया जा रहा था कि यह ‘कमाल मौला मस्जिद’ है। हालांकि, अदालत ने उनके इस दावे को खारिज करते हुए हिंदू पक्ष में अपना फैसला सुनाया है। वहीं, अदालत ने मस्जिद के लिए धार में ही जमीन देने का फैसला राज्य सरकार पर छोड़ दिया है।

मुस्लिम पक्ष याचिक पर पर सुनवाई करते हुए जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और आलोक अवस्थी की बेंच ने ने कहा कि ढांचे की धार्मिक प्रकृति हिंदू मंदिर की है। तमाम दलीले और ASI के सबूतों पर विचार करते हुए कोर्ट ने कहा कि भोजशाला परिसर कमाल मौला मस्जिद संरक्षित स्मारक है और परिसर की धार्मिक प्रकृति मंदिर की है। इस फैसले के बाद से ही लोग कमाल मौला के बारे में जानने की कोशिश कर रहे हैं, आइए जानते हैं कि वह कौन थे?

कमाल मौला कौन थे?

कमाल मौला का पूरा नाम हजरत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती था। वह एक प्रसिद्ध सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे। इतिहास का जानने वाले बताते हैं कि वे 13वीं से 14वीं शताब्दी के दौरान दिल्ली से मालवा (धार) आए थे। इस काल में उन्होंने यहां सूफी मत का प्रचार-प्रसार किया। कुछ इतिहासकारों की माने तो उन्हें मुगलों के जासूस के रूप में भी जाना जाता है। उनकी मृत्य के बाद उनके सम्मान में परिसर के पास एक मकबरा का निर्माण करा गया। खिलजी शासकों ने इस जगह का नाम 'कमाल मौला मस्जिद' रख दिया।

कौन थे कमाल मौला और कैसे जुड़ा भोजशाला केस में नाम?
कौन थे कमाल मौला और कैसे जुड़ा भोजशाला केस में नाम?

भोजशाला से कैसे जुड़ा नाम?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि कमाल मौला का नाम भोजशाला से कैसे जुड़ा। इसके पीछे ऐसा तर्क दिया जाता है कि कमाल मौला लंबे समय तक भोजशाला के आसपास ही रहे थे। उनकी मृत्यु के बाद भोजशाला परिसर के पास ही एक मजार बनवाया गया था। धीरे-धीरे मुस्लिम समुदाय के कुछ हिस्सों ने इस जगह को कमाल मौला मस्जिद कहना शुरू कर दिया। हालांकि, बाद में यह दोहरी पहचान भारत के सबसे संवेदनशील ऐतिहासिक और धार्मिक विवादों में से एक का केंद्र बन गई।

‘मस्जिद नहीं, हिंदू मंदिर है भोजशाला’

हालांकि, लंबी बहस के बाद कोर्ट ने पाया कि भोजशाला परिसर में सरस्वती मंदिर था और ऐतिहासिक साहित्य इसे संस्कृत अध्यन केंद्र के रूप में स्थापित करते हैं। आखिरी फैसला देते हुए बेंच ने कहा कि श्रद्धालुओं को मूलभूत सुविधाएं, उचित कानून व्यवस्था और देवता की पवित्रता और निर्मल स्वरूप का संरक्षण संवैधानिक कर्तव्य है। हमने पाया कि इस जगह पर हिंदू रीति-रिवाजों से पूजा-अर्चना समय के साथ कभी बंद नहीं हुआ। ऐतिहासिक साहित्य भी इस परिसर को संस्कृत अध्यन केंद्र बताते हैं तो पुरातात्विक संदर्भ देवी सरस्वती के मंदिर के अस्तित्व की और संकेत करते हैं।

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