जन्माष्टमी पर बदल जाता है बांधवगढ़ का स्वरूप, इस मंदिर में श्रीराम बनते हैं कान्हा और सीता बनती हैं राधारानी

Janmashtami 2026 Special Story: बांधवगढ़ किले के प्राचीन मंदिर में जन्माष्टमी की अनूठी परंपरा, जहां भगवान श्रीराम की कान्हा और माता सीता की राधा रानी के रूप में होती है विशेष पूजा।
Bandhavgarh temple Janmashtami tradition
जन्माष्टमी पर बदल जाता है बांधवगढ़ का स्वरूप(सोर्स- एआई जनरेटेड इमेज)
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Unique Janmashtami Celebration In Bandhavgarh: उमरिया की बांधवगढ़ की पहाड़ियों में स्थित प्राचीन कल्चुरी कालीन किला सिर्फ अपने ऐतिहासिक वैभव के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यहां जुड़ी धार्मिक मान्यताएं भी इसे देश के अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती हैं। ताला गांव से करीब 7 से 8 किलोमीटर दूर घने जंगलों और पहाड़ी क्षेत्र में स्थित यह ऐतिहासिक स्थल जन्माष्टमी के अवसर पर विशेष आस्था का केंद्र बन जाता है।

इस स्थान की सबसे अनोखी परंपरा जन्माष्टमी के दिन देखने को मिलती है। यहां भगवान श्रीराम की पूजा भगवान श्रीकृष्ण यानी कान्हा के स्वरूप में और माता सीता की पूजा राधा रानी के रूप में किए जाने की मान्यता है। इस अनूठी धार्मिक परंपरा के चलते जन्माष्टमी के दिन यहां श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ उमड़ती है।

लक्ष्मण को मिला था ‘भाई का किला’

बांधवगढ़ को लेकर पौराणिक मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने लंका पर नजर रखने के लिए यह किला अपने छोटे भाई लक्ष्मण को सौंपा था। इसी मान्यता के कारण इसका नाम ‘बांधवगढ़’, यानी भाई का किला, पड़ा। इतिहास और आस्था के इस संगम ने बांधवगढ़ को धार्मिक दृष्टि से भी विशेष बना दिया है। हालांकि इन पौराणिक मान्यताओं को धार्मिक परंपरा और स्थानीय विश्वास के रूप में देखा जाता है।

कठिन रास्ता, लेकिन आस्था अटूट

जन्माष्टमी के विशेष अवसर पर हजारों श्रद्धालु घने जंगलों और पहाड़ी क्षेत्र की कठिन चढ़ाई पार कर इस पवित्र स्थल तक पहुंचते हैं। दुर्गम रास्ते और कठिन यात्रा भी श्रद्धालुओं की आस्था को नहीं रोक पाती। लोग लंबी दूरी तय कर भगवान के दर्शन और विशेष पूजा में शामिल होने पहुंचते हैं। बांधवगढ़ की पहाड़ियों में इतिहास, प्रकृति और धार्मिक आस्था का यह अनोखा मेल श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। जन्माष्टमी के दिन यहां का वातावरण भक्ति और आस्था से सराबोर हो जाता है। 10वीं शताब्दी के प्राचीन मंदिर में विराजमान हैं भगवान राम, सीता, लक्ष्मण, कृष्ण, बलदाऊ और हनुमान की प्रतिमाएं; जन्माष्टमी पर उमड़ता है श्रद्धा का सैलाब।

तीन पीढ़ियों से मंदिर में सेवा दे रहा परिवार

राम-जानकी मंदिर की सेवा और पूजा-पाठ की परंपरा से जुड़े 40 वर्षीय संजय गौतम पिछले करीब 15 वर्षों से मंदिर की देखरेख और पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं। बताया जाता है कि उनके परिवार की मंदिर से गहरी धार्मिक परंपरा जुड़ी हुई है। उनके पिता संजय गौतम और नाना रामप्रसाद चतुर्वेदी भी मंदिर में पूजा-पाठ करते रहे हैं। इस तरह परिवार की तीन पीढ़ियों से मंदिर में पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है।

10वीं शताब्दी का प्राचीन मंदिर

मंदिर को करीब 10वीं शताब्दी का प्राचीन मंदिर बताया जाता है। यहां भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण, भगवान कृष्ण, बलदाऊ और हनुमान की प्राचीन प्रतिमाएं विराजमान हैं। प्राचीन स्थापत्य और धार्मिक प्रतिमाओं के कारण यह स्थान श्रद्धालुओं के साथ इतिहास एवं पुरातत्व में रुचि रखने वाले लोगों के लिए भी विशेष महत्व रखता है।

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रामायण काल से जुड़ी है मंदिर की किवदंती

राम-जानकी मंदिर को लेकर एक प्रचलित किवदंती भी सुनने को मिलती है। मान्यता है कि रावण का वध करने के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौट रहे थे, तब उन्होंने ताला क्षेत्र के इस स्थान को चुना था और इसे अपने छोटे भाई लक्ष्मण को भेंट किया था। इसी धार्मिक मान्यता के चलते समय के साथ इस स्थान से लोगों की आस्था जुड़ती चली गई, जो आज भी कायम है।

ऑनलाइन टिकिट उपलब्ध,बुजुर्गो का प्रवेश वर्जित

ताला रेंज के रेंजर राहुल किरार ने जानकारी देते हुए बताया है कि जन्माष्टमी त्यौहार के चलते श्रद्धालुओं के आगमन को लेकर ऑनलाइन टिकिट की सुविधा भी की गई हैं। वही 65 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गो के लिए प्रवेश वर्जित रखा गया हैं।

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