

Morena Dauji Temple Janmashtami : मुरैना श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व 4 सितंबर को जिलेभर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। मुरैना शहर से करीब तीन किलोमीटर दूर मुरैना गांव स्थित करीब 700 साल पुराने दाऊजी मंदिर में भी जन्माष्टमी को लेकर विशेष तैयारियां की जा रही हैं। इस अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण का दरबार फूल बंगला और दही हांडी से सजाया जाएगा। भगवान को मक्खन-मिश्री का भोग लगाया जाएगा और रात में जन्मोत्सव के दौरान विशेष पूजा-अर्चना होगी। मंदिर में हजारों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है।
दाऊजी मंदिर से जुड़ी मान्यता इसे क्षेत्र के अन्य धार्मिक स्थलों से अलग बनाती है। बताया जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने मुरैना गांव के परम भक्त गोपेश्वर यानी गोपराम स्वामी को दर्शन दिए थे। इसके बाद गोपेश्वर स्वामी ने मंदिर की स्थापना कराई। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें स्वप्न में कहा था कि यह मंदिर गोपेश्वर स्वामी के नाम से ही जाना जाएगा। मंदिर में विराजित भगवान की उत्पत्ति भी स्वयंभू मानी जाती है।
मान्यता के अनुसार गोपेश्वर स्वामी चार भाइयों में सबसे बड़े थे और परिवार में सभी उन्हें दाऊ कहकर बुलाते थे। इसी वजह से भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े इस मंदिर को आगे चलकर दाऊजी मंदिर के नाम से पहचान मिली। करीब सात शताब्दी पुराना यह मंदिर आज भी मुरैना और आसपास के क्षेत्रों के लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। विशेष पर्वों पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।
दाऊजी मंदिर की सबसे खास धार्मिक मान्यताओं में भगवान द्वारिकाधीश के यहां आने की परंपरा भी शामिल है। मान्यता है कि दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा से भगवान द्वारिकाधीश साढ़े तीन दिन के लिए मुरैना गांव स्थित दाऊजी मंदिर में आते हैं। इस दौरान भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं का आयोजन किया जाता है। बताया जाता है कि गोपेश्वर स्वामी कभी द्वारिका नहीं जा सके थे। उन्होंने भगवान से द्वारिका आने की इच्छा जताई थी, जिसके बाद भगवान ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं मुरैना आने का वचन दिया था।
दाऊजी मंदिर और मुरैना गांव से तीन प्रमुख मान्यताएं भी जुड़ी हैं। पहली मान्यता के अनुसार एकादशी से दीपावली के लक्ष्मी पूजन तक स्वामी परिवार में जन्म लेने वाला एक बच्चा पूतना लीला करता है। दूसरी मान्यता गाय और उसके बछड़े से जुड़ी है, जिसके अनुसार जिस रंग की गाय होती है, उसी रंग का बछड़ा उसके यहां जन्म लेता है। तीसरी मान्यता मंदिर के बाहर स्थित तालाब से जुड़ी है। कहा जाता है कि पड़वा के दिन तालाब में नाग देवता दर्शन देते हैं, जिसे भगवान द्वारिकाधीश के आगमन का संकेत माना जाता है।
दाऊजी मंदिर के पुजारी विजयकांत शर्मा ने बताया कि मंदिर करीब 700 साल पुराना है और यहां भगवान की उत्पत्ति स्वयंभू मानी जाती है। उन्होंने बताया कि गोपराम स्वामी भगवान श्रीकृष्ण के भक्त थे और मान्यता है कि भगवान ने उन्हें आशीर्वाद दिया था कि मंदिर उनके नाम से जाना जाएगा। जन्माष्टमी पर मंदिर में फूल बंगला और दही हांडी सजाई जाएगी। भगवान को मक्खन-मिश्री का भोग लगाया जाएगा और मुख्य प्रसाद के रूप में इसे श्रद्धालुओं में वितरित किया जाएगा। उन्होंने बताया कि पर्व पर हजारों श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है।
महिला श्रद्धालु निशा सिंघल ने बताया कि वह पिछले दो-तीन साल से लगातार दाऊजी मंदिर आ रही हैं। उनके अनुसार मंदिर की बहुत मान्यता है और यहां पूजा-अर्चना करने से मनोकामनाएं पूरी होने का विश्वास है। वहीं महिला श्रद्धालु शिल्पी मंगल ने बताया कि हर छठ बलदाऊ के जन्मदिन पर भगवान को भोग लगाया गया। उन्होंने कहा कि जन्माष्टमी पर भी मौका मिला तो मंदिर आएंगी, क्योंकि यहां आने से मन को शांति मिलती है। जन्माष्टमी के मौके पर एक बार फिर दाऊजी मंदिर में आस्था और भक्ति का बड़ा संगम देखने को मिलेगा।