

Highlights:
मंदसौर के गांधीसागर अभयारण्य में चट्टानों पर मौजूद हैं हजारों प्राचीन शैलचित्र।
मध्य प्रदेश पर्यटन के अनुसार, चतुर्भुजनाथ नाला का रॉक आर्ट क्षेत्र करीब 5 किलोमीटर में फैला है।
चित्रों में मानव जीवन, पशुओं, शिकार और सामाजिक गतिविधियों से जुड़ी आकृतियां मौजूद हैं।
पर्यटन संबंधी विवरणों में चित्रों को 6,000 से 12,000 वर्ष पुराने प्रागैतिहासिक काल से लेकर शुरुआती मध्यकाल तक के अलग-अलग दौर से जोड़ा गया है।
वर्ष 1977 में स्थानीय शिक्षक रमेश कुमार पंचोली और उनके साथियों ने इस स्थल की खोज की थी।
Gandhi Sagar Rock Paintings : मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में गांधीसागर अभयारण्य की पहाड़ियों के बीच ऐसी ऐतिहासिक धरोहर मौजूद है, जो हजारों साल पहले के मानव जीवन की कहानी बयां करती है। चतुर्भुजनाथ नाला रॉक पेंटिंग्स के नाम से पहचाने जाने वाले इन प्राचीन शैलचित्रों में मानव जीवन, पशुओं, शिकार और सामाजिक गतिविधियों से जुड़ी आकृतियां दिखाई देती हैं।
नवभारत की टीम ने इस ऐतिहासिक स्थल पर पहुंचकर शैलचित्रों का जायजा लिया। पहाड़ी से नीचे उतरकर और चतुर्भुज नाला पार करने के बाद चट्टानों पर उकेरी गईं ये आकृतियां नजर आती हैं।
गांधीसागर अभयारण्य में स्थित चतुर्भुजनाथ नाला रॉक पेंटिंग्स तक पहुंचने का रास्ता सामान्य पर्यटन स्थलों से अलग है। यहां पहुंचने के लिए पहाड़ी से नीचे उतरना पड़ता है और रास्ते में नाला भी पार करना होता है। इसके बाद चट्टानों पर बने प्राचीन चित्र दिखाई देने लगते हैं। प्राकृतिक परिवेश के बीच मौजूद ये शैलचित्र बताते हैं कि प्राचीन समय में मनुष्य अपनी गतिविधियों और अनुभवों को चित्रों के माध्यम से अभिव्यक्त करता था।
नवभारत की टीम ने भ्रमण के दौरान करीब 500 मीटर के क्षेत्र में चट्टानों पर बने शैलचित्रों को देखा। मध्य प्रदेश पर्यटन के अनुसार, चतुर्भुजनाथ नाला का पूरा रॉक आर्ट क्षेत्र लगभग 5 किलोमीटर तक फैला है और यहां हजारों चित्र मौजूद हैं। इन चित्रों में मनुष्यों और पशुओं की आकृतियों के साथ शिकार और सामाजिक गतिविधियों से जुड़े दृश्य भी शामिल हैं। लाल, गेरुआ, सफेद और काले रंगों से बनी ये आकृतियां उस समय के जीवन और प्राकृतिक परिवेश को समझने में मदद करती हैं।
इन शैलचित्रों की प्राचीनता इन्हें खास बनाती है। मध्य प्रदेश पर्यटन के प्रकाशित विवरण में यहां के चित्रों को लगभग 6,000 से 12,000 वर्ष पुराने प्रागैतिहासिक काल से लेकर शुरुआती मध्यकाल, यानी करीब 10वीं शताब्दी तक के अलग-अलग कालखंडों से जोड़ा गया है। हालांकि, सभी चित्र एक ही समय के नहीं हैं। प्रत्येक चित्र की सटीक उम्र और उसके निर्माण काल की पुष्टि के लिए विस्तृत पुरातात्विक अध्ययन जरूरी है। ये चित्र मानव सभ्यता के विकास और उस दौर की जीवनशैली को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
मध्य प्रदेश पर्यटन के अनुसार, चतुर्भुजनाथ नाला के इस रॉक आर्ट स्थल को वर्ष 1977 में स्थानीय स्कूल शिक्षक रमेश कुमार पंचोली और उनके साथियों ने खोजा था। इसके बाद से यह क्षेत्र प्राचीन कला, इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वाले लोगों के लिए महत्वपूर्ण आकर्षण बना हुआ है। गांधीसागर की प्राकृतिक खूबसूरती के बीच मौजूद यह धरोहर क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को भी सामने लाती है।
गांधीसागर क्षेत्र में पर्यटन की संभावनाएं बढ़ने के साथ चतुर्भुजनाथ नाला के शैलचित्रों को व्यापक पहचान दिलाई जा सकती है। हालांकि, इस धरोहर को प्राकृतिक क्षरण, मौसम और मानवीय गतिविधियों से बचाना भी जरूरी है। चट्टानों पर बने ये चित्र केवल प्राचीन कला के उदाहरण नहीं हैं, बल्कि मानव सभ्यता के अतीत को समझने का महत्वपूर्ण साधन हैं। इनके संरक्षण और उचित प्रचार से आने वाली पीढ़ियों को भी इस ऐतिहासिक विरासत को करीब से जानने का अवसर मिल सकता है।