MP ओबीसी आरक्षण पर फिर लगा 'ब्रेक', हाईकोर्ट ने 16 जून तक टाली सुनवाई; समान्य वर्ग ने रखीं यह दलीलें

Madhya Pradesh News: 27% ओबीसी आरक्षण मामले की सुनवाई 16 जून तक के लिए टल गई है। हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता अमन लेखी ने दलील दी कि केवल आबादी के आधार पर आरक्षण बढ़ाना संवैधानिक रूप से उचित नहीं है।
MP High Court OBC Reservation 27 Percent Hearing Postponed
जबलपुर हाईकोर्ट (सोर्स- सोशल मीडिया)
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MP OBC Reservation Case High Court: मध्य प्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण से जुड़े मामले में जबलपुर हाईकोर्ट में चल रही अंतिम सुनवाई एक बार फिर आगे बढ़ा दी गई है। पहले इस मामले की सुनवाई 13, 14 और 15 मई को प्रस्तावित थी।

हाईकोर्ट की ग्रीष्मकालीन छुट्टियों और चीफ जस्टिस के प्रमोशन की प्रक्रिया के चलते अब अगली तारीख 16 जून 2026 तय की गई है। माना जा रहा है कि अदालत की छुट्टियों और चीफ जस्टिस के संभावित सुप्रीम कोर्ट प्रमोशन के कारण यह मामला और लंबा खिंच सकता है।

16 जून तक स्थगित हुआ मामला

मध्य प्रदेश में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण से जुड़े बहुचर्चित मामले की सुनवाई एक बार फिर टल गई है। गुरुवार, 15 मई को चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच में सुनवाई हुई, जिसके बाद मामले को 16 जून 2026 तक के लिए स्थगित कर दिया गया। इससे पहले 13, 14 और 15 मई को अंतिम सुनवाई निर्धारित की गई थी, जिससे लंबे समय से लंबित इस विवाद पर जल्द निर्णय आने की उम्मीद जताई जा रही थी। हालांकि हाईकोर्ट की ग्रीष्मकालीन छुट्टियों के कारण अब सुनवाई जून तक टाल दी गई है।

आबादी के आधार पर आरक्षण बढ़ाना उचित नहीं- अमन लेखी

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता अमन लेखी ने अनुराधा भसीन मामले का हवाला देते हुए कोर्ट के सामने अपनी दलील रखी। उन्होंने कहा कि उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को स्पष्ट संदेश दिया था कि किसी भी मुद्दे का समाधान संवैधानिक दायरे और तय नियमों के भीतर रहकर ही किया जाना चाहिए। इसी संदर्भ में उन्होंने तर्क दिया कि 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने से पहले सरकार को 50 फीसदी आरक्षण सीमा और अन्य संवैधानिक प्रावधानों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए था। उनका कहना था कि केवल जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर आरक्षण का दायरा बढ़ाना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

सामान्य वर्ग ने सुनवाई के दौरान रखा पक्ष

सुनवाई के दौरान सामान्य वर्ग की तरफ से यह दलील भी दी गई कि जब सरकार स्वयं मान रही है कि पिछड़े वर्गों तक वर्षों से चलाई जा रही योजनाओं का पूरा लाभ नहीं पहुंच पाया, तो इसे प्रशासनिक असफलता माना जाना चाहिए। वरिष्ठ अधिवक्ता अमन लेखी ने तर्क रखा कि ऐसी परिस्थितियों का बोझ सामान्य वर्ग पर डालना उचित नहीं है।

उन्होंने अदालत से कहा कि यदि सरकार का उद्देश्य वास्तव में विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व बढ़ाना था, तो पहले सभी आरक्षित श्रेणियों की व्यापक समीक्षा की जानी चाहिए थी और उसके बाद संतुलित आधार पर नया आरक्षण ढांचा तैयार किया जाना चाहिए था।

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