

Historic Baldaau Temple Jabalpur: श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व देशभर में धूमधाम से मनाया जा रहा है कहीं मटकी फोड़ कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं तो कहीं राधा कृष्ण मंदिरों में विशेष पूजन आयोजित हो रहे हैं ऐसे में आज हम आपको दर्शन करवा रहे हैं श्री कृष्ण के बड़े भाई बलदाऊ मंदिर के जहां बलदाऊ यानी बलराम की प्राचीन मूर्ति भी स्थित है।
जबलपुर के कोतवाली इलाके के उपरेन गंज में स्थित यह मंदिर भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम यानी बलदाऊ जी को समर्पित है।
ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार मंदिर का निर्माण वर्ष 1879 में कराया गया था। इसका निर्माण राय बहादुर सेठ बंशीलाल अबीरचंद द्वारा करवाया गया था, जबकि मंदिर की नींव संवत 1879 में राय साहब पंडित गोविंद लाल पुरोहित द्वारा रखी गई थी। इसके बाद मुनीम वल्लभदास कोठारी द्वारा मंदिर को मूर्त रूप दिए जाने का उल्लेख है।
मंदिर की सबसे खास पहचान इसकी मराठा शैली की वास्तुकला है। बाहर से देखने पर यह किसी छोटे किले या राजमहल जैसा दिखाई देता है। प्रवेश द्वार पर ऊंची बुर्जनुमा संरचनाएं, झरोखे, परकोटा और छतरियां इसकी स्थापत्य शैली को विशिष्ट बनाते हैं। मंदिर में लगभग डेढ़ सौ वर्ष पुराने लकड़ी के दरवाजे और पुराने पत्थरों से बना फर्श भी इसकी प्राचीनता को दर्शाते हैं। वहीं मंदिर के गर्भगृह में काले पाषाण की भगवान बलराम की प्रतिमा विराजमान है। मंदिर परिसर से जुड़ी एक बड़ी गौशाला भी इसकी महत्वपूर्ण विशेषता रही है।
बलराम जी को भारतीय परंपरा में हलधर भी कहा जाता है और उन्हें कृषि, पशुधन तथा ग्रामीण जीवन से जोड़ा जाता है। इसी वजह से मंदिर में हलषष्ठी/हरछठ और बलराम जयंती, कृष्ण जन्माष्टमी और होली के अवसर पर विशेष पूजा होती है। इस मंदिर की एक अनोखी परंपरा यह है कि भगवान बलदाऊ को भैंस के दूध और माखन का भोग लगाया जाता है। यह परंपरा मंदिर को दूसरे कृष्ण-बलराम मंदिरों से अलग पहचान देती है।
एक दिलचस्प बात यह भी है कि जबलपुर शहर का यह मंदिर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भगवान बलराम को समर्पित ऐसे प्राचीन मंदिर देश में अपेक्षाकृत कम हैं। मध्य प्रदेश में यह दूसरा बलदाऊ मंदिर है जो सनातन परम्परा के साथ तीन संस्कृतियों को भी जोड़ता है। मराठा शैली में बने इस मंदिर में बल्लभ पंथ के अनुसार बलराम जी की मूर्ति स्थापित कर पूजन किया जाता है और पूजन एवं मंदिर की देखरेख की जिम्मेदारी राजस्थानी मारवाड़ी परिवार पर है जिनकी चार पीढ़ियां निरंतर यहां अपनी सेवाएं दे रहा है। इसलिए इसे जबलपुर की धार्मिक और स्थापत्य विरासत के एक अनोखे हिस्से के रूप में देखा जाता है।