Bhind News: पटवारी भर्ती 2008 में बड़ा खुलासा, 18 साल बाद खुली फर्जीवाड़े की पोल; 2 महिलाओं सहित 6 पर FIR दर्ज
Madhya Pradesh News: 2008 पटवारी भर्ती में फर्जी पीजीडीसीए डिप्लोमा का खुलासा। हाईकोर्ट के निर्देश पर 6 लोगों पर FIR। रायपुर की यूनिवर्सिटी के प्रमाणपत्र मिले अमान्य।
- Written By: सजल रघुवंशी
प्रतीकात्म इमेज (सोर्स- सोशल मीडिया)
Bhind Patwari Recruitment Case 2008: भिंड में वर्ष 2008 की पटवारी भर्ती परीक्षा से जुड़ा मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। लगभग 18 वर्षों तक चली जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद भर्ती से जुड़े कथित फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है। हाईकोर्ट के निर्देश पर पुलिस ने दो महिलाओं सहित छह आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है।
आरोप है कि संबंधित अभ्यर्थियों ने कथित तौर पर नकली पीजीडीसीए कंप्यूटर डिप्लोमा प्रमाणपत्रों का उपयोग कर सरकारी नौकरी पाने की कोशिश की। जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया कि जिन दस्तावेजों को प्रस्तुत किया गया था, उस समय संबंधित विश्वविद्यालय को मान्यता प्राप्त नहीं थी। मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद प्रशासनिक स्तर पर भी हलचल तेज हो गई है।
जांच के दौरान हुआ बड़ा खुलासा
जांच के दौरान दस्तावेजों की पड़ताल में पता चला कि कुछ उम्मीदवारों ने पीजीडीसीए डिप्लोमा प्रमाणपत्र टेक्नॉलॉजी ऑफ साइंस यूनिवर्सिटी (रायपुर) के नाम से प्रस्तुत किए थे। शुरुआती जांच में जिला प्रशासन को इन प्रमाणपत्रों की प्रमाणिकता संदिग्ध लगी, जिसके बाद उनकी वैधता को लेकर सवाल खड़े किए गए।
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6 लोगों के खिलाफ कार्रवाई
जांच पूरी होने के बाद प्रशासन ने वंदना सोनी, पूनम मिश्रा, अशोक कुमार, अरुण मांझी और पंकज यादव समेत छह अभ्यर्थियों के पीजीडीसीए प्रमाणपत्रों को अमान्य घोषित कर दिया। प्रशासन के अनुसार जिन दस्तावेजों के आधार पर सरकारी पद हासिल करने का प्रयास किया गया था, वह निर्धारित नियमों के तहत वैध और मान्यता प्राप्त नहीं पाए गए।
ग्वालियर हाईकोर्ट पहुंचा मामला
मामले में उस समय नया घटनाक्रम सामने आया, जब एक महिला अभ्यर्थी ने अपने दस्तावेजों को वैध बताते हुए ग्वालियर हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की। याचिका में आरोप लगाया गया कि प्रशासन ने गलत आधार पर उसके प्रमाणपत्रों को अमान्य घोषित किया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए मध्य प्रदेश के हाईकोर्ट ने विस्तृत जांच कराने के निर्देश जारी किए।
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अदालत से निर्देश मिलने के बाद पुलिस और प्रशासन ने पूरे मामले की विस्तृत जांच शुरू की। पड़ताल में सामने आया कि जिस टेक्नॉलॉजी ऑफ साइंस यूनिवर्सिटी के नाम पर पीजीडीसीए प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए गए थे, उसे उस अवधि में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की मान्यता प्राप्त नहीं थी। वहीं, अभ्यर्थियों द्वारा वर्ष 2005 में संबंधित कोर्स करने के दावों पर भी जांच एजेंसियों ने संदेह जताया है।
