संतान से जुड़ी कोई हो परेशानी, तो ‘यशोदा जयंती’ के अवसर पर इस मुहूर्त में करें पूजा
- Written By: नवभारत डेस्क
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सीमा कुमारी
नई दिल्ली: ‘यशोदा जयंती ‘(Yashoda Jayanti) इस वर्ष आज यानी 12 फरवरी, रविवार के दिन मनाई जा रही है। हर वर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मां यशोदा की जयंती मनाई जाती है। इस दिन मां यशोदा का जन्मदिन मनाया जाता है। इस दिन पूरे विधि-विधान के साथ मां यशोदा की पूजा की जाती है। शास्त्रों के अनुसार, अगर कोई स्त्री इस दिन पूरी श्रद्धा के साथ माता यशोदा और भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करती है तो उसे संतान संबंधित सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं। साथ ही सभी मनोकामनाएं भी पूर्ण हो जाती हैं। आइए जानें इस साल यशोदा जयंती कब मनाई जाएगी और यशोदा जयंती का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि, और इसकी कथा –
यशोदा जयंती 2023 तिथि
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फाल्गुन के महीने में कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को यशोदा जयंती का उत्सव मनाया जाता है। यह तिथि 12 फरवरी 2023 के दिन पड़ेगी। ऐसे में 12 फरवरी के दिन यशोदा जयंती का पर्व मनाया जाएगा। इस दिन का शुरुआत व समापन समय इस प्रकार से है-
यशोदा जयंती 2023 समय
षष्ठी तिथि शुरुआत समय:
11 फरवरी 2023, रात 09:07 बजे से
षष्ठी तिथि समापन समय:
12 फरवरी 2023, रात 09:45 बजे तक
पूजा विधि
- इस दिन सुबह सवेरे उठकर सभी नित्यकर्मों से निवृत्त होकर स्नानादि कर लेना चाहिए। इसके बाद साफ वस्त्र पहनें और माता यशोदा का ध्यान करें।
- इसके बाद मां यशोदा की श्रीकृष्ण की गोद में लिए हुए फोटो या प्रतिमा को स्थापित करें।
- अगर आपके पास इस तरह की तस्वीर नहीं है तो आप कृष्ण जी की तस्वीर के सामने दीपक जलाएं।
इसके बाद माता यशोदा को लाल चुनरी चढ़ाएं। फिर, उन्हें मिष्ठान का भोग लगाएं और कृष्ण जी को मक्खन का भोग अर्पित करें। फिर मां यशोदा और कृष्ण जी की आरती करें। इसके बाद गायत्री मंत्र का जाप करें। पूजा पूरी होने के बाद व्यक्ति को अपनी मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करनी चाहिए।
कथा
पौराणिक कथा के अनुसार माता यशोदा ने भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की थी। जिससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान मांगने के लिए कहा तब माता यशोदा ने कहा कि मेरी इच्छा तब ही पूर्ण होगी जब आप मुझे पुत्र रूप में मेरे घर आएंगे। इसके बाद भगवान विष्णु ने कहा कि आने वाले समय में वासुदेव और देवकी मां के घर में जन्म लूंगा। लेकिन, मेरा लालन पालन आप ही करेंगी। समय बीतता गया और ऐसा ही हुआ।
भगवान श्री कृष्ण ने देवकी और वासुदेव के यहां आठवीं संतान के रूप में पुत्र का जन्म लिया और इसके बाद वासुदेव उन्हें नंद और यशोदा के यहां छोड़ आए। जिससे उन्हें कंस के क्रोध से बचाया जा सके और उनका लालन पालन अच्छी प्रकार से हो सके। इसके बाद माता यशोदा ने कृष्ण जी का लालन पालन किया। जिसका तुलना भी नहीं की जा सकती है। माता यशोदा के विषय में श्रीमद्भागवत में कहा गया है- ‘मुक्तिदाता भगवान से जो कृपा प्रसाद नन्दरानी यशोदा को मिला, वैसा न ब्रह्माजी को, न शंकर को, न उनकी अर्धांगिनी लक्ष्मी जी को कभी प्राप्त हुआ।
