

Blue Turmeric Health Benefits: हल्दी भारतीय रसोई का ऐसा मसाला है, जिसका इस्तेमाल सदियों से खाने के साथ-साथ पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में भी किया जाता रहा है। आमतौर पर हम सभी पीली हल्दी यानी Curcuma longa के बारे में जानते हैं, लेकिन हल्दी की एक दुर्लभ प्रजाति ऐसी भी है जिसका रंग अंदर से नीला-काला दिखाई देता है। इसे नीली हल्दी या काली हल्दी कहा जाता है। इसका वानस्पतिक नाम Curcuma caesia है।
पीली हल्दी के मुकाबले नीली हल्दी की जड़ का रंग भी गहरा नीला या नीला-काला होता है और इसकी खुशबू भी काफी अलग होती है। इसमें कपूर जैसी तेज और हल्की कड़वी सी सुगंध होती है। इस हल्दी का इस्तेमाल रोजाना खाना पकाने के लिए नहीं किया जाता, बल्कि नीली हल्दी का इस्तेमाल पारंपरिक चिकित्सा और आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में किया जाता है।
नीली हल्दी का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से शरीर में इंफ्लेमेशन और जोड़ों की समस्या में किया जाता रहा है। हालांकि पीली हल्दी में मौजूद करक्यूमिन पर कहीं अधिक शोध उपलब्ध हैं, नीली हल्दी में भी कई प्राकृतिक यौगिक पाए जाते हैं जिनमें मुख्य रूप से एंटी इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं।
नीली हल्दी में मौजूद कुछ प्राकृतिक यौगिक में प्रयोगशाला अध्ययन के दौरान रोगाणुरोधी गुण पाए गए है। इसी वजह से पारंपरिक उपचारों में हल्दी की विभिन्न प्रजातियों का इस्तेमाल त्वचा की छोटी-मोटी समस्या और घाव के लिए किया जाता रहा है।
पारंपरिक चिकित्सा में नीली हल्दी का इस्तेमाल गैस, ब्लोटिंग और पाचन संबंधी असहजता के लिए किया जाता रहा है। इसके सुगंधित यौगिक पाचन तंत्र पर प्रभाव डालते हैं।
नीली हल्दी का पारंपरिक उपयोग खांसी, कफ और सांस से जुड़ी कुछ परेशानियों में भी किया जाता है। इसका तेज सुगंध और प्राकृतिक तेलों के कारण इसका इस्तेमाल पारंपरिक उपचार में किया जाता रहा है।
खासकर गर्भावस्था, स्तनपान, किसी गंभीर बीमारी या नियमित दवाओं के सेवन की स्थिति में नीली हल्दी का सेवन करने से पहले डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।