गोवर्धन मौण्डु तू बड़ो… लोक गीतों से गुर्जर समाज मनाता हैं गोवर्धन पूजा, जानिए इसकी मान्यताएं
दिवाली से अगले दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को गोवर्धन पूजन किया जाएगा और इस बार यह गोर्वधन पूजा का उत्सव 2 नवंबर को मनाया जाएगा। गोवर्धन पूजा को गुर्जर समाज में अलग तरीके से मनाया जाता हैं।
- Written By: दीपिका पाल
गोवर्धन पूजा का गुर्जर समाज में महत्व (सौ.सोशल मीडिया)
Diwali 2024: दिवाली के पांच दिवसीय त्योहार की शुरुआत हो गई है जहां पर इस त्योहार का पर्व 5 दिनों का होता है। धनतेरस का त्योहार जहां पर बीते दिन मनाया गया है वहीं पर दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा का महत्व होता है। इस दिन का संबंध भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत से है दिवाली से अगले दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को गोवर्धन पूजन किया जाएगा और इस बार यह गोर्वधन पूजा का उत्सव 2 नवंबर को मनाया जाएगा। गोवर्धन पूजा को गुर्जर समाज में अलग तरीके से मनाया जाता हैं इसकी अलग मान्यता होती है चलिए जानते हैं इसके बारे में।
गुर्जर समाज में है त्योहार का महत्व
यहां पर गुर्जर समाज में इस त्योहार का काफी महत्व होता है। यहां पर गोवर्धन महाराज को विराजमान किया जाता है। इस दौरान शाम के समय समाज के लोग सामूहिक रूप में गोवर्धन महाराज की पूजा करते हैं। पूजा की थाली में हल्दी, खील-बताशे, पूड़ा-पूड़ी और अन्य कई तरह के पकवान रखे जाते हैं। गोवर्धन महाराज के पास ही दूध बिलोने वाली रई और लठ भी रखा जाता है। गुर्जर समुदाय के लोग मंत्रोच्चार गोवर्धन मौण्डु तू बड़ो, तो से बड़ो नौ कोय, जैसो हमकू होवे ऐसो सब कायकू होए गाते हैं, अर्थात हे गोवर्धन महाराज आप सबसे बड़े हैं, आपसे बड़ा कोई नही है और आपसे प्रार्थना है कि जैसा अच्छा हमारे जीवन में हो रहा है ऐसा सभी के जीवन में होना चाहिए।
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नई पीढ़ी के युवा भी मनाते हैं त्योहार
यहां पर गुर्जर समाज के इस परंपरा को गोवर्धन पूजा के दिन नए युवा भी अपना रहे है। यह पर्व गुर्जर समाज के सभी गांवों में इकट्ठा होकर मनाते हैं। उनका दावा है कि सदियों से ऐसी ही परंपरा चली आ रही है। यहां पर धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि, ब्रजवासियों को मूसलाधार वर्षा से बचाने के लिए भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को सात दिनों तक अपनी सबसे छोटी अंगुली पर उठाए रखा था। उसी समय से गोवर्धन पर्वत को पूजने की परंपरा का शुभारंभ हुआ था। इस दिन अन्नकूट का भोग लगाया जाता है। गुर्जर समाज में इस त्योहार का विशेष महत्व होता है।
