जयंती विशेष: वो कांग्रेस नेता जिसने की इंदिरा की खिलाफत, बना महाराष्ट्र का पहला मुख्यमंत्री, डिप्टी पीएम पद को भी किया सुशोभित
आज यानी 12 मार्च को संयुक्त महाराष्ट्र के पहले मुख्यमंत्री और देश के पांचवे उपप्रधानमंत्री की जयंती है। इन्हें महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार का राजनीतिक गुरु भी माना जाता है।
- Written By: आकाश मसने
इंदिरा गांधी के साथ यशवंतराव चव्हाण (सोर्स: सोशल मीडिया)
नवभारत डिजिटल डेस्क: आज यानी 12 मार्च को संयुक्त महाराष्ट्र के पहले मुख्यमंत्री और देश के पांचवे उपप्रधानमंत्री की जयंती है। स्वतंत्रता की लड़ाई से लेकर महाराष्ट्र और देश की राजनीति में उनका अच्छा-खासा प्रभाव रहा। इन्हें महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार का राजनीतिक गुरु भी माना जाता है।
हम बात कर रहे है महाराष्ट्र के पहले मुख्यमंत्री यशवंतराव चव्हाण की। यशवंतराव चव्हाण का जन्म 12 मार्च 1913 कराड में एक सामान्य किसान परिवार में हुआ। बचपन में ही उनके सिर से पिता का साया उठ गया। यशवंतराव को अपनी की ओर से ही आत्मनिर्भरता और देशभक्ति की शिक्षा मिली। यशवंतराव चव्हाण की प्राथमिक शिक्षा कराड में ही हुई। इसके बाद उन्होंने बीए और एलएलबी कोल्हापुर और पुणे से की।
महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन से जुड़े
साल 1930 में महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन से जुड़कर चव्हाण आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। 1932 में वे पहली बार जेल गए। जेल में रहते हुए मार्क्सवाद और मानवेंद्रनाथ रॉय के विचारों के साथ उनका परिचय हुआ और बाहर निकलकर वे कांग्रेस से जुड़ गए।
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यशवंतराव चव्हाण छात्र जीवन से ही कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता थे और कानून की पढ़ाई करते हुए वर्ष 1940 में सतारा जिला कांग्रेस के प्रमुख बने। महाराष्ट्र के गठन से पहले वे 1957 में बंबई के मुख्यमंत्री और राज्य कांग्रेस के नेता बने। महाराष्ट्र राज्य के गठन के बाद वे 1960 में इसके पहले मुख्यमंत्री बने।
एक गरीब मराठा परिवार में हुआ था जन्म
यशवंतराव चव्हाण का जन्म 12 मार्च 1913 को एक गरीब मराठा परिवार में हुआ था। तब उनका गांव महाराष्ट्र के सतारा जिले में था और अब सांगली जिले में है। चव्हाण ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया। वे महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन का हिस्सा रहे और कई बार जेल गए।
विपक्ष ने खुद पेश किया था प्रशंसा में प्रस्ताव
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के करीबी सहयोगी रहे चव्हाण ने महाराष्ट्र के गठन में अहम भूमिका निभाई थी। इस राज्य के गठन के संघर्ष में उनकी भूमिका विवादास्पद रही, लेकिन बाद में उन्होंने भाषा के आधार पर अलग राज्य के गठन में अग्रणी भूमिका निभाई। इसी के चलते 1 मई 1960 को महाराष्ट्र का गठन हुआ।
चव्हाण ऐसे मुख्यमंत्री थे, जिनकी तारीफ के लिए विपक्ष ने खुद विधानसभा में प्रस्ताव पेश किया था। क्योंकि वे वर्ष 1962 में राज्य की राजनीति छोड़कर केंद्र की राजनीति में जा रहे थे।
नेहरू को लिखा पत्र
जब लंबे संघर्ष के बाद महाराष्ट्र का गठन हुआ और उसके तुरंत बाद चव्हाण को राजनीति के लिए केंद्र में बुला लिया गया, तो उन्होंने पंडित नेहरू को लिखा कि उन्हें भारत का रक्षा मंत्री बनने की योग्यता के बारे में कोई जानकारी नहीं है।
पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ यशवंतराव चव्हाण (सोर्स: सोशल मीडिया)
मेनन के इस्तीफे के बाद केंद्र में मिली जिम्मेदारी
हालांकि, यशवंतराव चव्हाण के आत्मविश्वास ने उन्हें अपना राज्य छोड़ने पर मजबूर कर दिया। केंद्र सरकार में चव्हाण ने रक्षा, गृह, विदेश और वित्त मंत्री के साथ-साथ उप प्रधानमंत्री के रूप में भी काम किया। उन्हें रक्षा मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता है, जिसके लिए उन्हें पंडित नेहरू ने विशेष रूप से विवादास्पद रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन के इस्तीफे के बाद बुलाया था।
वित्त मंत्री के रूप में यशवंतराव चव्हाण को वर्ष 1973-74 का ब्लैक बजट पेश करने के लिए भी जाना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि 1973-74 के बजट में 550 करोड़ रुपये का घाटा दिखाया गया था।
इंदिरा गांधी के खिलाफ दिया था वोट
1975 में जब कोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया था, तब कांग्रेस के सभी नेता उन्हें प्रधानमंत्री बनाए रखने पर अड़े हुए थे। वहीं, कहा जाता है कि यशवंतराव चव्हाण इसके पक्ष में नहीं थे और उन्होंने पार्टी मीटिंग में इंदिरा गांधी के खिलाफ वोट दिया था।
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मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि खुद इंदिरा गांधी भी यशवंतराव से सतर्क थीं, क्योंकि चव्हाण ने गृह मंत्री रहते हुए उनका फोन टैप करवाया था। वाईबी चव्हाण ने खुद को प्रधानमंत्री बनाने की वकालत तक की थी और लाल बहादुर शास्त्री ने तो उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाने की बात भी कही थी। ऐसे में इंदिरा को लगा कि अगर चव्हाण उनके उत्तराधिकारी बन गए तो वे दोबारा कभी प्रधानमंत्री नहीं बन पाएंगी।
