OBC आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, अब ₹8 लाख से ज्यादा कमाई पर भी मिलेगा लाभ, जानें पूरा अपडेट
Supreme Court OBC NCL Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी नॉन-क्रीमी लेयर नियमों में ऐतिहासिक बदलाव करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल वेतन के आधार पर आरक्षण से वंचित करना असंवैधानिक और भेदभावपूर्ण है।
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
सुप्रीम कोर्ट, (सोर्स- सोशल मीडिया)
Non Creamy Layer Income New Limit: सुप्रीम कोर्ट ने अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के नियमों में एक ऐसा ऐतिहासिक बदलाव किया है, जो देश के हजारों युवाओं के करियर की दिशा बदल सकता है। जस्टिस पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल वेतन को पैमाना बनाकर किसी को ‘क्रीमी लेयर’ में डालना और आरक्षण से वंचित करना पूरी तरह से असंवैधानिक और भेदभावपूर्ण है।
यह फैसला उन उम्मीदवारों के लिए एक बड़ी जीत है जो लंबे समय से विभागीय नियमों की गलत व्याख्या के कारण संघर्ष कर रहे थे। अदालत के इस रुख से न केवल आरक्षण का मूल मकसद बहाल होगा, बल्कि सरकारी और पीएसयू कर्मचारियों के बच्चों को भी अब समान अवसर मिल सकेंगे।
अब वेतन नहीं बनेगा बाधा
स्रोतों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ किया है कि यदि माता-पिता ग्रुप-IV में सरकारी नौकरी करते हैं और उनकी सालाना आय 8 लाख रुपये से अधिक भी हो जाती है, तो भी उन्हें क्रीमी लेयर में नहीं गिना जाएगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आय सीमा के निर्धारण में कृषि से होने वाली कमाई को भी नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
इस निर्णय का सीधा मतलब यह है कि अब केवल अन्य स्रोतों जैसे बिजनेस या प्रॉपर्टी से होने वाली 3 साल की औसत पारिवारिक आय ही 8 लाख रुपये की सीमा के लिए आधार बनेगी। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और निजी संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों के लिए भी कोर्ट ने राहत दी है, क्योंकि अब केवल उनके वेतन के आधार पर उन्हें आरक्षण से बाहर नहीं किया जा सकेगा।
सम्बंधित ख़बरें
Father’s Day: पापा कभी नहीं रोते…क्या सच में? जिम्मेदारियों के बोझ से दबे भारतीय पुरुषों के दर्द की असली वजह
CJI Suryakant On Cyber Fraud: साइबर ठगों को बताया ‘परजीवी’, कहा- समाज के हित में इनका जेल में रहना जरूरी
दल-बदल करवा कर संविधान की धज्जियां उड़ा रही है बीजेपी और शिवसेना, सुप्रीम कोर्ट की देरी पर भड़की अंजलि दमानिया
SC ST Creamy Layer और इनकम टैक्स पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा रुख, जानें टैक्स छूट की मांग पर अदालत ने क्या कहा?
2004 का वह विवादित पत्र अब हुआ अमान्य
अदालत ने अपने विश्लेषण में पाया कि डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग (DoPT) द्वारा 2004 में जारी किया गया स्पष्टीकरण पत्र मूल संवैधानिक ढांचे के खिलाफ था। कोर्ट ने उस पत्र के पैरा 9 को अब पूरी तरह अमान्य घोषित कर दिया है, क्योंकि वह 1993 के मूल ऑफिस मेमोरेंडम के मानदंडों की अनदेखी कर रहा था। पीठ ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि सरकारी कर्मचारियों के समान पद रखने वाले PSU या निजी क्षेत्र के लोगों को केवल अधिक वेतन के कारण बाहर किया जाता है, तो यह अनुच्छेद 14 के तहत ‘हॉस्टाइल डिस्क्रिमिनेशन’ यानी शत्रुतापूर्ण भेदभाव है। इस फैसले ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि बैंक या प्राइवेट नौकरियों में कार्यरत लोगों के वेतन को सीधे तौर पर ‘क्रीमी लेयर’ का आधार नहीं माना जा सकता जब तक कि पदों की समानता तय न हो जाए।
हजारों युवाओं के लिए खुले नौकरी और प्रमोशन के द्वार
इस निर्णय की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे पिछली तारीख से लागू किया जाएगा, जिसका लाभ उन अनेकों लोगों को मिलेगा जो पहले गलत परिभाषा के कारण आरक्षण से बाहर कर दिए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने उन उम्मीदवारों के लिए विशेष निर्देश जारी किए हैं जो 2012 से 2017 के बीच की सिविल सेवा परीक्षाओं से संबंधित कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे।
कोर्ट ने DoPT को आदेश दिया है कि वह अगले 6 महीने के भीतर इन मामलों का फिर से सत्यापन करे और पात्र उम्मीदवारों को OBC-NCL स्टेटस प्रदान करे। यदि इस प्रक्रिया के कारण मौजूदा कर्मचारियों की सीनियरिटी पर कोई असर पड़ता है, तो सरकार को उनके लिए अतिरिक्त पद सृजित करने होंगे, जिसका आश्वासन सरकार ने पहले ही दिया है।
यह भी पढ़ें: नोएडा की फैक्ट्री में आग का तांडव: 250 जिंदगियों पर गहराया संकट, मची भारी भगदड़
आरक्षण का मूल मकसद होगा बहाल!
एक्सपर्ट्स की मानें तो सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से भविष्य में होने वाली सभी सिविल सेवा परीक्षा और सरकारी नौकरियों में भर्ती की प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी। अब भविष्य की परीक्षाओं में वैध OBC-NCL सर्टिफिकेट को प्राथमिकता दी जाएगी और केवल वेतन के आधार पर आवेदनों को खारिज करना बंद कर दिया जाएगा।
इसके साथ ही 27 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान का लाभ अब उन वास्तविक हकदारों तक पहुंच सकेगा जो पहले केवल तकनीकी पेचों में उलझकर रह जाते थे। कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि सरकार का 2004 का पत्र DoPT की सामान्य प्रक्रिया से जारी नहीं हुआ था और उसकी फाइलों का कोई रिकॉर्ड भी नहीं था, जो इसकी वैधता पर बड़ा सवाल उठाता है।
