

90 के दशक में फिल्म फाइनेंसिंग, रंगदारी और धमकियों के आरोपों ने बॉलीवुड और मुंबई के आपराधिक नेटवर्क के संबंधों को चर्चा में रखा।
1993 के मुंबई बम धमाकों की जांच में दाऊद इब्राहिम और उसके नेटवर्क के सदस्यों के नाम सामने आए।
टाइगर श्रॉफ फायरिंग केस में सोशल मीडिया पर बिश्नोई गैंग के नाम से जिम्मेदारी लेने का दावा सामने आया है।
Bollywood Underworld Connection History: मायानगरी मुंबई की चमक-दमक के पीछे एक ऐसा काला साया मंडरा रहा है, जिसकी आहट ने एक बार फिर पूरी फिल्म इंडस्ट्री की नींद उड़ा दी है। रविवार की रात जुहू की सड़कों पर गूंजी गोलियों की तड़तड़ाहट ने यह साबित कर दिया है कि रुपहले पर्दे के सितारों की सुरक्षा अब सिर्फ एक छलावा बनकर रह गई है।
इस बार निशाना थे बॉलीवुड के बेताज एक्शन किंग टाइगर श्रॉफ, जो इस खौफनाक हमले में बाल-बाल बच गए। लेकिन इस घटना ने सिर्फ एक अभिनेता की जान पर बन आई आफत तक सीमित नहीं रखा, बल्कि मायानगरी के उन पुराने, सड़े हुए जख्मों को कुरेद दिया है, जिन्हें लोग शायद भूलने लगे थे।
सोशल मीडिया पर लॉरेंस बिश्नोई गैंग के गुर्गों द्वारा इस हमले की जिम्मेदारी लेने और सलमान खान के करीबियों को खुलेआम मौत का फरमान जारी करने के बाद, हर कोई एक ही खौफनाक सवाल पूछ रहा है, क्या 90 के दशक का वो खौफनाक अंडरवर्ल्ड, दाऊद और छोटा शकील का वो काला दौर, अब एक नए और ज्यादा खतरनाक अवतार में बॉलीवुड की देहरी पर फिर से लौट आया है?
रुपहले परदे की चकाचौंध और मुंबई के सीलन भरे अंडरवर्ल्ड की दुनिया, इन दोनों के बीच के रिश्ते किसी फिल्मी कहानी से कम रोमांचक और डरावने नहीं रहे हैं। इसकी जड़ें कई दशक पुरानी हैं, जब मायानगरी में फिल्मों के निर्माण के लिए पैसों का जुगाड़ करना आसान नहीं था। उस शुरुआती दौर में जब मेकर्स निजी निवेशकों और कारोबारियों का दरवाजा खटखटाते थे, तभी से हाजी मस्तान जैसे कुख्यात तस्करों का नाम फिल्मी हस्तियों के मेल-जोल और फिल्मों में पैसे लगाने की चर्चाओं के साथ जुड़ने लगा था।
लेकिन समय के पहिए ने जैसे ही 1980 और 90 का दशक पार किया, यह मेल-जोल एक खौफनाक साये में बदल गया। यह वह दौर था जब फिल्म इंडस्ट्री पर अंडरवर्ल्ड का कथित शिकंजा कसने की कहानियां हर तरफ गूंजने लगीं। फिल्म निर्माताओं और कलाकारों को मिलने वाली धमकियों, जबरन रंगदारी वसूलने और फिल्म फाइनेंसिंग के काले कारोबार में इन आपराधिक गिरोहों की पैठ जगजाहिर होने लगी थी। हालात यहां तक आ पहुंचे कि विदेशों में फिल्मों के अधिकार (स्क्रीनिंग राइट्स) और कलाकारों के चयन (कास्टिंग) जैसे अहम फैसलों पर भी परदे के पीछे बैठे इन ताकतों के दबाव के आरोप लगने लगे।
1990 के दशक के अंत और 2000 के दशक की शुरुआत में फिल्म फाइनेंसिंग के औपचारिक रास्ते बढ़ने लगे। कॉरपोरेट कंपनियों, बैंकों और संगठित स्टूडियो के आने से फिल्म निर्माण की वित्तीय व्यवस्था में बदलाव हुआ। इससे इंडस्ट्री की फंडिंग पहले के मुकाबले अधिक व्यवस्थित हुई।
हाजी मस्तान मुंबई के शुरुआती चर्चित तस्करों में शामिल था। उसका नाम बंदरगाहों के जरिए सोने, चांदी और इलेक्ट्रॉनिक्स की तस्करी से जुड़ा रहा। समय के साथ उसने फिल्मी हस्तियों के बीच भी संपर्क बनाए और फिल्म निर्माण में निवेश किया।
हाजी मस्तान ने अपनी सार्वजनिक छवि एक ऐसे व्यक्ति के रूप में बनाने की कोशिश की, जो गरीबों की मदद करता है और फिल्मी दुनिया के लोगों से उसके अच्छे संबंध हैं। हालांकि, उसकी लोकप्रिय छवि के साथ उसके आपराधिक कारोबार का इतिहास भी जुड़ा रहा।
हाजी मस्तान के जीवन और मुंबई के अंडरवर्ल्ड से प्रेरित किरदार हिंदी फिल्मों में भी दिखाई दिए। 1975 की फिल्म 'दीवार' और 2010 में रिलीज हुई 'वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई' को अक्सर उस दौर के अंडरवर्ल्ड की छवि और कहानियों के संदर्भ में याद किया जाता है।
दाऊद इब्राहिम ने मुंबई के अपराध जगत में अपनी शुरुआत छोटे अपराधों से की और बाद में एक संगठित आपराधिक नेटवर्क खड़ा किया। उसके भाई शब्बीर की 1981 में हत्या के बाद हुई गैंगवार ने मुंबई के अपराध जगत में संघर्ष को और तेज किया।
बाद में दाऊद के नेटवर्क को 'डी-कंपनी' के नाम से जाना जाने लगा। उसके खिलाफ हत्या, तस्करी, जबरन वसूली और अन्य गंभीर अपराधों के आरोप लगे। वह भारत छोड़कर विदेश चला गया और उसके नेटवर्क की गतिविधियों का दायरा अंतरराष्ट्रीय स्तर तक फैल गया।
फिल्म इंडस्ट्री के साथ डी-कंपनी के कथित संबंधों को लेकर भी लंबे समय तक चर्चा होती रही। फिल्मी हस्तियों के साथ मुलाकातों, विदेशों में आयोजित पार्टियों और फिल्म निर्माण में कथित निवेश के मामले सामने आए। कुछ मामलों में फिल्म निर्माताओं को धमकियां दिए जाने और उनसे पैसे वसूलने के आरोप भी लगे।
12 मार्च 1993 को मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने देश की सुरक्षा व्यवस्था और मुंबई के अपराध जगत को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए। जांच में दाऊद इब्राहिम और उसके नेटवर्क के सदस्यों के नाम सामने आए। इसके बाद पुलिस की कार्रवाई और अंडरवर्ल्ड के खिलाफ अभियान तेज हुआ।
इसी दौरान फिल्म इंडस्ट्री में संस्थागत बदलाव भी हुए। बैंक और वित्तीय संस्थान फिल्म प्रोडक्शन के लिए कर्ज देने लगे, कॉरपोरेट स्टूडियो का विस्तार हुआ और फिल्म निर्माण की वित्तीय व्यवस्था अधिक औपचारिक हुई।
इन बदलावों से फिल्म फाइनेंसिंग में पारदर्शिता बढ़ाने में मदद मिली। हालांकि, आपराधिक नेटवर्क के तरीके और उनके काम करने के क्षेत्र समय के साथ बदलते रहे।
बीते कुछ वर्षों में लॉरेंस बिश्नोई गैंग का नाम कई चर्चित आपराधिक मामलों और फिल्मी हस्तियों को दी गई धमकियों के सिलसिले में सामने आया है। सलमान खान को भी कई बार धमकियां मिली हैं। अप्रैल 2024 में उनके बांद्रा स्थित आवास के बाहर गोलीबारी हुई थी। मुंबई पुलिस ने इस मामले में लॉरेंस बिश्नोई के नेटवर्क से जुड़े लोगों की भूमिका का आरोप लगाया था।
सितंबर 2025 में अभिनेत्री दिशा पाटनी के परिवार के घर के बाहर बरेली में गोलीबारी की घटना भी सामने आई थी। इसके अलावा, फरवरी 2026 में फिल्म निर्माता रोहित शेट्टी के घर के बाहर हुई गोलीबारी के मामले में भी पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की। इन घटनाओं में अलग-अलग आरोपियों और कथित नेटवर्क की भूमिका की जांच संबंधित एजेंसियों ने की।
अब टाइगर श्रॉफ की कार पर हुई फायरिंग के बाद फिर गैंगस्टर नेटवर्क का नाम चर्चा में है। सोशल मीडिया पर एक व्यक्ति ने हमले की जिम्मेदारी लेने का दावा करते हुए सलमान खान के साथ काम करने वालों को धमकी दी। पुलिस इस दावे, आरोपियों के संपर्कों और हमले के मकसद की जांच कर रही है।
लॉरेंस बिश्नोई पंजाब के फाजिल्का जिले का रहने वाला गैंगस्टर है। उसने चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज में पढ़ाई की और छात्र राजनीति से भी जुड़ा रहा। बाद में उसका नाम हत्या, रंगदारी, धमकी और गैंगवार के कई मामलों में सामने आया।
समय के साथ उसके नेटवर्क का विस्तार पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और अन्य क्षेत्रों तक होने के आरोप लगे। सिद्धू मूसेवाला हत्याकांड और सलमान खान को धमकियों के मामलों में भी उसका नाम सामने आया। वह गुजरात की साबरमती जेल में बंद है।