थलापति विजय से एमजीआर तक, दक्षिण भारत में ‘सिने-पॉलिटिक्स’ का फॉर्मूला क्यों सुपरहिट? ये है असली वजह
South Indian Politics: दो साल पहले बनी नई राजनीतिक पार्टी TVK की कामयाबी दक्षिण भारत के सियासत में एक तेज झोंके की तरह आई है। फिल्म अभिनेता से नेता बने विजय की सफलता किसी चमत्कार से कम नहीं है।
- Written By: मनोज आर्या
दक्षिण भारत की राजनीति में सिनेमा का तड़का, (कॉन्सेप्ट फोटो- AI)
Film Stars In South Indian Politics: तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में थलापति विजय की पार्टी टीवीके ने अपने प्रदर्शन से सभी कौ चौंका दिया। चुनाव से लगभग दो साल पहले बनी नई राजनीतिक पार्टी की कामयाबी दक्षिण भारत के सियासत में एक तेज झोंके की तरह आई है। फिल्म अभिनेता से नेता बने विजय की सफलता किसी चमत्कार से कम नहीं है। हालांकि, तमिलानाडु में ‘पॉलिटिकल सिनेमा’ का एक लंबा इतिहास रहा है।
1940 के दशक से ही क्षेत्र में समाजिक सरोकार वाली फिल्में बनते आई हैं, जिनमें समाजिक असमानता, अवसरों की कमी और सामाजिक न्याय को काफी प्राथमिकता से दर्शाया जाता है। इसी परिवेश में तमिलनाडु की पीढ़ियां बड़ी हुईं और सिनेमा उनकी राजनीतिक समझ का प्रमुख हिस्सा बन गया।
तमिलनाडु में दो द्रविड़ पार्टियों का दबदबा
गौरतलब है कि तमिलनाडु की सत्ता में लंबे समय तक दो द्रविड़ पार्टियों का दबदबा रहा। हालांकि, हालिया चुनाव के नतीजे इस बात के साफ संकेत हैं कि वहां की जनता इन दोनों पुरानी पार्टियों से उब गई थी। यह स्पष्ट था कि इन्हें भी कोई फिल्म इंडस्ट्री से आया शख्स ही टक्कर दे सकता था। इससे पहले कमल हासन और रजनीकांत एक विकल्प के रूप में सामने आए, लेकिन दोनों सफल नहीं हो पाए। इनके विपरित, विजय उसी द्रविड परंपरा को आगे बढ़ाते हैं, जिस परंपरा से डीएमके और अन्नडीएमके निकली हैं।
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(तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में TVK की जीत का जश्न मनाते विजय के प्रशंसक, सोर्स- IANS)
इसके साथ ही, थलापति अपनी फिल्मों के जरिए भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ लड़ने वाले एक मसीहा की छवि गढ़ने में कामयाब रहे। उनकी फिल्मों में समाज की अलग-अलग समस्याओं को लेकर आक्रोश की अभिव्यक्ति होती है। 70 के दशक में अमिताभ बच्चन ने जिस तरह एंग्री मैन की छवि बनाई थी, ठीक वैसे ही विजय ने अपनी फिल्मों में थोड़े दूसरे रूप में पेश करते हैं। आम जीवन में भी इनका व्यवहार इसी अंदाज में देखने को मिलता है, जिससे खासकर युवा सीधा जुड़ते हैं।
दक्षिण भारत में फिल्मी अभिनेता क्यों सफल?
साउथ इंडिया की सियासत में फिल्मी स्टारों का क्षेत्रीय क्षत्रप के रूप में उभरना सिर्फ उनके ग्लैमर का नतीजा नहीं है, बल्कि उत्तर भारत के उलट इसके पीछे एक गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक प्रक्रिया रही है। वे इन 3 वजहों से अधिकर सफल होते हैं।
1. फिल्मी कैरेक्टर को जमीन पर उतारना
साउथ इंडियन फिल्म के ज्यादातर अभिनेता अपनी फिल्मों में या तो पौराणिक किरदार निभाते हैं या फिर सिस्टम के खिलाफ लड़ते हुए दिखाए जाते हैं। वे अपनी इस ‘स्क्रीन इमेज’ को राजनीतिक एजेंडे में इतनी खूबसूरती से पिरोते हैं कि वह वोट बैंक में तब्दील हो जाती है।
2. भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता का तड़का
साउथ इंडियन फिल्म के अभिनेता हमेशा अपनी स्थानीय भाषा को गौरव के साथ प्रस्तुत करते है। इसके अलावा क्षेत्रीय अस्मिता को भी काफी मजबूती से प्राथमिकता देते हैं। उत्तर भारतीय अभिनेताओं के विपरित दक्षिण भारत के फिल्मी कलाकार उन सरोकारों से जुड़ी होती है, जो आम लोगों से सीधा कनेक्ट करता है। इसका चुनाव में फिल्मी अभिनेताओं को काफी फायदा मिलता है।
3. ग्लैमर नहीं सामाजिक आंदोलन प्राथमिकता
अन्नादुरई और करुणानिधि जैसे नेता पहले लेखक और विचारक थे, फिर वह राजनेता के रूप में उभरे। उन्होंने अपने क्राफ्ट और फिल्मों का उपयोग द्रविड विचारधारा कौ फैलाने के लिए एक मीडियम के रूप में किया। इसलिए कहा जाता है कि साउथ इंडियन फिल्म के सितारों की जड़ें ग्लैमर में नहींस बल्कि एक मजबूत सामाजिक आंदोलन में थीं।
तमिलनाडु में फैन क्लब की क्या भूमिका?
साउथ इंडिया, खासकर के तमिलनाडु में फिल्मी स्टारों के प्रशंसकों द्वारा ‘फैन क्लब’ बनाने का प्रचलन आम है। तमिल भाष में इन्हें ‘रसिगर मंदरम’ के नाम से जाना जाता है। तमिलनाडु की राजनीति व संस्कृति में फैन क्लब्स का महत्व राजनीतिक इकाइयों से कम नहीं है, जो फिल्मी अभिनेताओं को कई तरह लाभ पहुंचाता है।
- फिल्मी सितारों के ये फैन क्लब काफी मजबूत और संगठित होते हैं। ये क्लब अक्सर रक्तदान शिविर, मुफ्त भोजन वितरण और आपदा के समय में करने जैसे कई सामाजिक कार्यों में काफी सक्रिय रहते हैं। इससे इनके प्रति आम लोगों की सहानुभूति बढ़ जाती है।
- इन क्लबों का एक रजिस्टर्ड स्ट्रक्चर होता है। इसके तहत इनके पदाधिकारी और जिला अध्यक्ष भी होते हैं। फिल्मी अभिनेता अक्सर इन क्लबों के पदाधिकारियों के साथ बैठक करते हैं, जिससे प्रशंसकों का अपने हीरो के प्रति एक विश्वसनीय रिश्ता बन जाता है।
- जैसे ही कोई फिल्मी स्टार राजनीति में आने की घोषणा करता है, इन्हीं क्लबों के सदस्य एक आदेश में किसी राजनीतिक पार्टी के काडर के रूप ले लेते हैं। इस तरह फिल्म अभिनेताओं को शून्य से शुरुआत नहीं करनी पड़ती। उनके पास पहले से ही समर्पित कार्यकर्ताओं की फैज तैयार होती है।
साउथ की राजनीति में फिल्मों सितारों का उदय
सी.एन. अन्नादुरई: तमिल फिल्मों के बेहतरीन स्क्रीनप्ले राइटर सी.एन. अन्नादुरई ने डीएमके की नींव रखी थी। ये फिल्म इंडस्ट्री के पहले शख्स थे, जो राज्य के मुख्यमंत्री पद तक का सफर तय किया। साल 1967 में मद्रास राज्य के आखिरी और 1969 में तमिलानाडु राज्य का गठन होने पर इसके पहले मुख्यमंत्री बने।
एम. करुणानिधि: साल 1949 में सक्रिनप्ले राइटर के तौर पर अपना करियर शुरु करने वाले एम. करुणानिधि पांच बार (करीब 20 साल) तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे। राजनीतिक में रहते हुए उन्होंने कभी फिल्म लेखन के काम को नहीं छोड़ा। अपनी फिल्मी करियर में उन्होंने करीब 75 फिल्मों की स्क्रिप्ट व डॉयलॉग्स लिखे।
(फिल्मी दुनिया से मुख्यमंत्री बनने वाले एम. करुणानिधि, (सोर्स- सोशल मीडिया)
एमजीआर: तमिल फिल्म इंडस्ट्री के सुपरस्टार एमजी रामचंद्रन (MGR) ने करीभी 140 फिल्मों में काम किया। साल 1972 में अन्नाडीएमके बनाई और 1977 में मुख्यमंत्री बने। भारतीय इतिहास में यह पहला मौका था, जब किसी फिल्मी हीरो ने राज्य की कमान संभाली।
एनटीआर: तेलुगु फिल्मों के भगवान के रूप में पहचान बना चुके एनटी रामाराव (NTR) ने मार्च 1982 में आंध्र प्रदेश में तेलुगू देशम पार्टी बनाया और कांग्रेस के दशकों पुराने किले को महज 9 महीने में ही ढहाकर मुख्यमंत्री बने। इन्होंने तीन बार राज्य की कमान संभाली।
जयललिता: फिल्मी दुनिया से राजनीति में धूम मचाने वाली जे. जयललिता तमिलनाडु के उन नेताओं में से एक हैं, जो फिल्मी पहचान को राजनीति में बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया। कई फिल्मों में एमजीआर के साथ काम करने वालीं जयललिता बाद में उनके जरिए ही राजनीति में आईं और अन्नाडीएमके नेत्री के तौर पर वह छह बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं।
(तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता, सोर्स- सोशल मीडिया)
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पवन कल्याण: बतौर लीड एक्टर 25 से अधिक तेलुगू फिल्मों में काम करने वाले पवन कल्याण 2014 में जनसेना पार्टी की गठन के से साथ सियासी सफर का शुरुआत किए। हालांकि, शुरुआती दौर में मिली असफलताओं के बावजदू भी वह राजनीति के मैदान में मजबूती से डटे रहे। 2024 में टीडीपी और भाजपा के साथ गठबंधन कर उन्होंने 21 सीटें जीतीं और आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बने।
