Explainer: अयोध्या, तिरुपति से सबरीमाला तक, मंदिरों को दिया गया चंदा कितना सुरक्षित; क्यों उठ रहे हैं सवाल?

Temple Donation Safety Explained: अयोध्या से अलग इस समय मुंबई के मशहूर सिद्धिविनायक मंदिर से दान की चोरी के आरोप का मामला सामने आने की बाद महाराष्ट्र की राजनीति में सियासी बयानबाजी तेज हो गई है।
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मंदिरों में दान कितना सुरक्षित?(AI जेनरेटेड इमेज)
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Why Questions Raised Over Temple Donation Safety:  देश की प्रमुख मंदिरों में किस तरह की प्रशासनिक व्यवस्था लागू कर दान की चोरी को रोका जा सकता है। यह सवाल सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन यह समय की मांग बन चुका है। जब से अयोध्या राम मंदिर में लाखों रुपये के दान की चोरी की खबरें सामने आई है, तब से लोगों में यह बातचीत का अहम हिस्सा बन गया है। इस बीच सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या मंदिरों को संचालन किसी ट्रस्ट या व्यक्तियों के समूह या सरकार के हाथों में सौंप दिया जाए या फिर कॉरपोरेट की तरह एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) की व्यवस्था लागू की जाए।

इन सवालों के पीछे का मुख्य वजह धार्मिक स्थलों से चंदा की चोरी ने भक्तों के भरोसे को तोड़ दिया है। चंदा चोरी की बहस या उससे जुड़े सवाल नए नहीं हैं। अयोध्या राम मंदिर से पहले देश का सबसे अमीर मंदिर तिरुपति का भगवान वेंकटेश्वर मंदिर भी इस तरह के विवादों से अछूता नहीं रहा है। और न ही इसने सबरीमाला मंदिर को बख्शा है।

अयोध्या से मुंबई तक चंदा चोरी

अयोध्या से अलग इस समय मुंबई के मशहूर सिद्धिविनायक मंदिर से दान की चोरी के आरोप का मामला सामने आने की बाद महाराष्ट्र की राजनीति में सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। राम मंदिर और तिरुपति का वेंकटेश्वर मंदिर कानूनी बोर्ड के अंतरर्गत संचालित किए जाते हैं। इसके बोर्ड में नागरिक सेवा अधिकारी और विभागीय कर्मचारी शामिल होते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह व्यवस्था काफी दुरुस्ती के साथ काम करती है, जहां किसी भी गड़बड़ी की गुंजाइश बेहद कम होती है।

तिरुपति में चोरी का मामला

सबसे पहले भगवान वेंकटेश्वर के मंदिर में लागू प्रशासनिक व्यवस्था को समझते हैं। इस मंदिर को तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) संचालित करती है। टीटीडी, आंध्र प्रदेश धर्मार्थ और हिंदू धार्मिक संस्थान और बंदोबस्ती अधिनियम, 1987 के तहत स्थापित एक वैधानिक बॉडी है। पहली बार यह सास 1933 में तत्कालीन मद्रास (टीटीडी) एक्ट के तहत सरकारी कंट्रोल में आया था।

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तिरुपति बालाजी मंदिर की तस्वीर(सोर्स- सोशल मीडिया)

दैनिक प्रशासन का संचालन अधिशासी कार्यालय के हाथ में होता है और इसके प्रमुख आमतौर पर आईएएस (IAS) अधिकारी होते हैं। इस कार्यालय में करीब 14,890 आउटसोर्स कर्मचारी काम करते हैं। इसके अलावा हजारों श्रीवारी सेवक भी यहां काम करते हैं। बोर्ड में राजनीतिक प्रतिनिधि और पदेन सदस्य होते हैं, लेकिन यह सिर्फ एक पॉलिसी बॉडी है जो बजट को भी मंजूरी देती है। मंदिर ट्रस्ट से जुड़े बैंक खातों का ऑडिट राज्य सरकार करती है, जिससे यह राज्य विधायिका की निगरानी के दायरे में आता है।

कैसे काम करता है टीटीडी?

तिरुमला तिरुपति देवस्थानम के एक अधिकारी के मुताबिक, बोर्ड की बैठक साल में कई बार जरूरत के हिसाब से बुलाई जाती है। 2026-27 के वार्षिक बजट के लिए हुई बैठक भी शामिल है। साल 2025-26 में बोर्ड की बैठक आठ अलग-अलग महीनों में हुई। बोर्ड के एक अन्य सदस्य ने बताया कि सिर्फ जमा राशि 20,000 करोड़ रुपये है और दान देने वालों की संख्या 1.97 लाख है। ये दानदाता हर साल एक लाख रुपये से करोड़ों रुपये तक का दान करते हैं। टीटीडी अधिकारी के मुताबिक, खाते आंध्र प्रदेश सरकार के ऑडिट विभाग द्वारा आंतरिक ऑडिट और वैधानिक ऑडिट से गुजरते हैं और इन्हें नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) के ऑडिट के तहत लाया जा रहा है।

चोरी का कैसे खुला राज?

अप्रैल 2023 में सुरक्षा अधिकारी वाई. सतीश कुमार ने तिरुमला के टाउन-1 पुलिस स्टेशन में सीवी रवि कुमार के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। रवि कुमार का काम उन्हें आवंटित करेंसी बास्केट से अमेरिकी डॉलर को अलग करना था। सतीश कुमार ने आरोप लगाया कि उन्होंने रवि कुमार के हाथों को उनके निजी अंगों की ओर अजीब तरह से जाते देखा। अपनी शिकायत में, सतीश ने आरोप लगाया कि रवि कुमार ने 100 अमेरिकी डॉलर के नौ नोट चुराए थे। शिकायत की जांच की गई और पुलिस ने चार्जशीट दायर की।

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चोरी का कैसे खुला राज?(AI जेनरेटेड इमेज)

आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के एक आदेश के मुताबिक, इस चार्जशीट में सीवी रवि कुमार को आईपीसी की धारा 379 और 381 के तहत आरोपी बनाया गया। अजीब बात यह है कि शिकायतकर्ता ने स्वेच्छा से समझौता कर लिया और नतीजा ये हुआ कि आरोपी को आईपीसी की धारा 320(8) के तहत बरी कर दिया गया। 19 सितंबर, 2025 के अपने आदेश में, न्यायमूर्ति गन्नमनेनी रामकृष्ण प्रसाद ने लोक अदालत के आदेश को निलंबित कर दिया और स्वतः संज्ञान लेते हुए आईजीपी, सीबी-सीआईडी को जांच करने और टीटीडी से पूरा रिकॉर्ड तुरंत जब्त करने का आदेश दिया।

रवि कुमार ने मानी चोरी की बात

14 नवंबर को 2025 को, सतीश कुमार का शव ताड़ीपत्री के पास एक रेलवे ट्रैक से बरामद किया गया था। यह मामला फिर से हाई कोर्ट गया और अदालत ने 2 दिसंबर 2025 तक पूरा ब्योरा पेश करने का आदेश दिया। कुछ दिनों बाद, रवि कुमार एक वीडियो में दिखाई दिए जो वायरल हो गया। इस वीडियो में उन्होंने कहा कि उन्होंने पाप किया था और उन्होंने प्रायश्चित के रूप में अपनी 90 प्रतिशत संपत्तियां, जिनकी कीमत 14 करोड़ रुपये बताई जा रही है, मंदिर को दान कर दी थीं।

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सुरक्षा को लेकर क्यों उठ रहे सवाल?

हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) और सीआईडी ने रवि कुमार और टीटीडी के अन्य अधिकारियों से कथित तौर पर जुड़े मामले में अदालत को एक सीलबंद लिफाफा सौंपा। यह मामला अभी अदालत के सामने आना बाकी है। जनवरी में, सीआईडी को सतीश कुमार की मृत्यु की जांच में तेजी लाने के लिए कहा गया था। जांच का मकसद यह पता लगाना था कि क्या वह ट्रेन से गिर गए थे या यह हत्या था। चोरी का यह मामला व्यवस्था के मजबूत रहने के बावजूद पारदर्शिता पर सवाल उठाता है।

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