

Supreme Court Stays Madras High Court Order: भारतीय राजनीति और न्यायपालिका के इतिहास में कभी-कभी ऐसे मामले सामने आते हैं जो न केवल कानूनी विशेषज्ञों बल्कि आम जनता को भी हैरान कर देते हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प मामला तमिलनाडु की राजनीति से निकलकर आया है, जहां विधानसभा चुनाव के करीब 10 साल बाद एक उम्मीदवार को 'विजेता' घोषित किया गया, लेकिन अब देश की सबसे बड़ी अदालत ने उस पर रोक लगा दी है।
यह कानूनी लड़ाई 2016 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों से शुरू हुई थी। उस समय DMK के नेता एम. अप्पावु ने अपने प्रतिद्वंद्वी AIADMK उम्मीदवार इनबादुरई की जीत को चुनौती देते हुए एक चुनावी याचिका दायर की थी। अप्पावु का आरोप था कि चुनाव के दौरान कुछ गड़बड़ियां हुई थीं। दिलचस्प बात यह है कि जिस विधानसभा कार्यकाल के लिए यह याचिका थी, वह काफी पहले ही समाप्त हो चुका है। लेकिन कानूनी प्रक्रिया की धीमी गति के कारण, इस पर फैसला आने में एक दशक का समय लग गया।
मई 2026 में, मद्रास हाई कोर्ट ने इस लंबी चली कानूनी जंग पर अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने एम. अप्पावु को विजेता घोषित कर दिया। हालांकि अब इसका कोई राजनीतिक महत्व नहीं रह गया था क्योंकि कार्यकाल खत्म हो चुका था, लेकिन कोर्ट ने इसे एक 'सांकेतिक राहत' माना। हाई कोर्ट ने यहीं रुकने के बजाय इनबादुरई की MLA पेंशन रोकने का भी निर्देश दे दिया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि हाई कोर्ट ने अपने फैसले में देरी के लिए सुप्रीम कोर्ट की भी कड़ी आलोचना की थी। हाई कोर्ट का तर्क था कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाए गए स्थगन की वजह से यह मामला 2019 से लंबित पड़ा था।
मद्रास हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ इनबादुरई ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सोमवार को जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान इनबादुरई की ओर से दिग्गज वकील मुकुल रोहतगी पेश हुए।
रोहतगी ने दलील दी कि हाई कोर्ट का आदेश न केवल कानूनी रूप से गलत था, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के नजरिए पर टिप्पणी करना भी हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र के लिहाज से उचित नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने इन तर्कों को गंभीरता से लेते हुए हाई कोर्ट के आदेश के मुख्य हिस्से पर अंतरिम रोक लगा दी और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है।