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Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पूर्व केंद्रीय मंत्री और पशु अधिकार कार्यकर्ता मेनका गांधी को कड़ी फटकार लगाई है। मामला आवारा कुत्तों से जुड़े मामले में एक पॉडकास्ट के दौरान मेनका गांधी द्वारा की गई टिप्पणियों और उनकी ‘बॉडी लैंग्वेज’ पर कोर्ट ने गहरी नाराजगी जताई। शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि यह हमारी दरियादिली है कि हम उन पर अवमानना की कार्रवाई नहीं कर रहे हैं।
देश के भावी CJI जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजनिया की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि मेनका गांधी ने पॉडकास्ट में जो कहा, वह गंभीर था। कोर्ट ने उनके वकील राजू रामचंद्रन से पूछा कि क्या उन्होंने अपनी क्लाइंट की बातें सुनी हैं? जजों ने स्पष्ट किया कि मेनका गांधी की टिप्पणियां सीधे तौर पर अदालत की अवमानना के दायरे में आती हैं।
बहस के दौरान एक तीखा मोड़ तब आया जब मेनका गांधी के वकील राजू रामचंद्रन ने दलील दी कि कोर्ट को सावधान रहना चाहिए। इस पर पीठ ने नाराजगी जताते हुए कहा कि आप हमें नसीहत दे रहे हैं, जबकि आपकी क्लाइंट जिसे चाहे और जिस पर चाहे हर तरह की टिप्पणियां कर रही हैं।
जब रामचंद्रन ने कहा कि यह अवमानना की सुनवाई नहीं है और जिक्र किया कि वे 26/11 के आतंकी अजमल कसाब के लिए भी पेश हुए थे, तो जस्टिस नाथ और भड़क गए। उन्होंने तपाक से जवाब दिया कि कसाब ने भी कोर्ट की अवमानना नहीं की थी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सवाल दागा कि जब मेनका गांधी पशु अधिकार कार्यकर्ता के साथ मंत्री भी थीं तो उन्होंने आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए बजट और योजनाओं में क्या योगदान दिया।
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याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि नसबंदी से कुत्तों की आक्रामकता कम होती है, लेकिन ज्यादातर शहरों में इसे ठीक से लागू नहीं किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि कोर्ट की कुछ पिछली टिप्पणियों के कारण डॉग फीडर्स पर हमले हो रहे हैं। इस पर जस्टिस नाथ ने दोहराया कि अदालत की बात कोई व्यंग्य नहीं बल्कि गंभीर थी।
पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर आवारा कुत्तों के हमले में बच्चों या बुजुर्गों की मौत या चोट होती है, तो राज्य सरकारों से भारी मुआवजा दिलाया जाएगा। कोर्ट ने यह भी सवाल किया था कि जो लोग कुत्तों को खाना खिलाते हैं, उनकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और अगर वे जानवरों से इतना प्रेम करते हैं तो उन्हें अपने घर क्यों नहीं रखते।