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मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बयान, कहा- बराबरी का एक रास्ता अब UCC….

Muslim Personal Law: सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पर्सनल लॉ और महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को लेकर अहम सुनवाई हुई। शरिया कानून, कानूनी शून्यता और UCC पर CJI और जजों ने क्या टिप्पणियां कीं।

  • Written By: अर्पित शुक्ला
Updated On: Mar 10, 2026 | 02:14 PM

सुप्रीम कोर्ट (इमेज-सोशल मीडिया)

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Supreme Court on UCC: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम सुनवाई के दौरान कहा कि देश की सभी महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के लिए समान नागरिक संहिता (UCC) की जरूरत है। यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान की गई जिसमें मुस्लिम महिलाओं को बराबर उत्तराधिकार अधिकार देने की मांग की गई है। सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए।

पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील Prashant Bhushan से कई सवाल किए। जस्टिस बागची ने Bombay High Court के ऐतिहासिक ‘नरसू अप्पा माली’ फैसले का जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि पर्सनल लॉ को संवैधानिक कसौटी पर नहीं परखा जा सकता। उन्होंने पूछा कि क्या अदालत किसी पर्सनल लॉ की संवैधानिकता पर फैसला दे सकती है।

अदालत की चिंताएं और अहम सवाल

पीठ ने यह भी पूछा कि अगर अदालत शरिया के विरासत कानून को रद्द कर देती है तो क्या इससे कोई कानूनी शून्य पैदा नहीं होगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि सुधार की कोशिश में कहीं ऐसा न हो कि मुस्लिम महिलाओं को पहले से मिल रहे अधिकारों से भी कम मिल जाए। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर 1937 का शरिया एक्ट खत्म हो जाता है तो क्या इससे अनावश्यक कानूनी खालीपन पैदा नहीं होगा।

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प्रशांत भूषण की दलील

इन सवालों का जवाब देते हुए प्रशांत भूषण ने कहा कि यदि शरिया विरासत कानून को रद्द किया जाता है, तो उस स्थिति में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम लागू हो सकता है। अदालत यह भी घोषित कर सकती है कि मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों के समान विरासत अधिकार मिलें।

शायरा बानो फैसले का हवाला

अदालत के हस्तक्षेप के अधिकार पर भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के Shayara Bano v. Union of India फैसले का उल्लेख किया, जिसमें तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया गया था। उनका कहना था कि इस फैसले के बाद ऐसी स्थिति नहीं रहनी चाहिए जहां मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार न मिलें।

विरासत नागरिक अधिकार, धार्मिक नहीं

भूषण ने तर्क दिया कि विरासत का मामला एक नागरिक अधिकार है और इसे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ कहकर सुरक्षित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 एक वैधानिक कानून है और अदालत इसकी भेदभावपूर्ण धाराओं को निरस्त कर सकती है।

UCC और विधायिका की भूमिका

सुनवाई के दौरान यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) का मुद्दा भी उठा। जस्टिस बागची ने कहा कि क्या इस विषय को विधायिका पर छोड़ देना बेहतर नहीं होगा, क्योंकि राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत समान नागरिक संहिता बनाना विधायिका का काम है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने भी सहमति जताते हुए कहा कि इसका एक समाधान यूनिफॉर्म सिविल कोड हो सकता है।

जस्टिस बागची ने यह भी टिप्पणी की कि “एक पुरुष के लिए एक पत्नी” का नियम अभी सभी समुदायों पर समान रूप से लागू नहीं है। उन्होंने सवाल किया कि क्या अदालत सभी बहुविवाह को असंवैधानिक घोषित कर सकती है। इसलिए नीति निर्देशक सिद्धांतों को लागू करने के लिए विधायी शक्ति का सम्मान जरूरी है।

अदालत का निर्देश

पीठ ने यह भी कहा कि अगर खुद मुस्लिम महिलाएं शरिया एक्ट 1937 से बाहर निकलने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाती हैं तो न्यायिक हस्तक्षेप अधिक उचित होगा। इस पर प्रशांत भूषण ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं में कुछ मुस्लिम महिलाएं भी शामिल हैं।

यह भी पढ़ें- ‘सिर्फ झगड़ा करना अपराध नहीं…’, दहेज केस में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा? सास-ससुर को दे दी राहत

अंत में अदालत ने याचिका में संशोधन करने का सुझाव दिया और कहा कि इसमें यह स्पष्ट किया जाए कि अगर शरिया के विरासत प्रावधानों को रद्द किया जाता है तो उसके बाद कानूनी व्यवस्था क्या होगी। प्रशांत भूषण द्वारा संशोधन के लिए सहमति जताने के बाद अदालत ने मामले की अगली सुनवाई स्थगित कर दी।

Supreme court hering on challenging shariat inheritance law and muslim women right ucc news

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Published On: Mar 10, 2026 | 02:14 PM

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