क्या है ‘रोमियो-जूलियट’ कानून? नाबालिगों का प्यार बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने किया जिक्र, जानें पूरा मामला
Supreme Court on POCSO Act: पॉक्सो में रोमियो जूलियट क्लॉज एक प्रावधान है, जिसका उद्देश्य उम्र में करीब-करीब किशोरों के बीच सहमति से चलने वाले यौन संबंधों की रक्षा करना है।
- Written By: अर्पित शुक्ला
सुप्रीम कोर्ट (सोर्स- सोशल मीडिया)
Supreme Court News: बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाया गया पॉक्सो कानून (POCSO) कई बार उन्हीं के खिलाफ इस्तेमाल होता नजर आता है। सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही इसमें ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज जोड़ने को भी कहा है, ताकि नाबालिगों को प्रेम संबंधों के कारण कठघरे में न खड़ा किया जाए। यह निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें हाई कोर्ट ने नाबालिग लड़की से यौन उत्पीड़न के आरोपी को जमानत दी थी।
यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के दुरुपयोग के कई मामले सामने आए हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से ‘रोमियो-जूलियट’ धारा जोड़ने का निर्देश दिया, ताकि वास्तविक किशोर संबंधों को इस कानून के कठोर प्रावधानों से राहत मिल सके। शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पॉक्सो मामलों में जमानत पर सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट पीड़ित की अनिवार्य मेडिकल उम्र जांच का आदेश नहीं दे सकते।
क्या है POCSO का रोमियो-जूलियट क्लॉज?
रोमियो-जूलियट क्लॉज का उद्देश्य लगभग समान उम्र के किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों की रक्षा करना है। यह प्रावधान पॉक्सो अधिनियम में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है, लेकिन कुछ अदालतों ने ऐसे मामलों में विवेक का इस्तेमाल किया है। सरल शब्दों में, यदि दो किशोर सहमति से रिश्ते में हैं और उनकी उम्र में मामूली अंतर है, तो अदालतें फैसला सुनाते समय इस पहलू पर विचार कर सकती हैं। उदाहरण के तौर पर, यदि 17 वर्षीय लड़की और 18 वर्षीय लड़का सहमति से संबंध में हैं, तो अदालतें अपेक्षाकृत उदार रुख अपना सकती हैं। हालांकि, जब उम्र का अंतर ज्यादा हो या जबरदस्ती का मामला हो, तो कानून पूरी सख्ती से लागू होगा।
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इलाहाबाद हाई कोर्ट का आदेश रद्द
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि चूंकि इस कानून के दुरुपयोग को लेकर बार-बार न्यायिक संज्ञान लिया गया है, इसलिए इस फैसले की एक प्रति भारत सरकार के विधि सचिव को भेजी जाए। पीठ ने इसे “आज के बच्चों और कल के नेताओं की सुरक्षा” के लिए न्याय की गंभीर अभिव्यक्ति बताया। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें जमानत के स्तर पर पीड़ित की मेडिकल उम्र जांच कराने के निर्देश दिए गए थे, और इसे सीआरपीसी की धारा 439 के तहत अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया।
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क्या है पूरा मामला?
यह मामला उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने से जुड़ा है, जिसमें नाबालिग लड़की से जुड़े यौन उत्पीड़न के एक मामले में आरोपी को जमानत दी गई थी। जमानत देते समय हाई कोर्ट ने निर्देश दिया था कि पॉक्सो अधिनियम के तहत हर मामले में शुरुआत में ही मेडिकल एज डिटरमिनेशन टेस्ट कराया जाए, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने अनुचित ठहराया है।
