SC ST Creamy Layer और इनकम टैक्स पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा रुख, जानें टैक्स छूट की मांग पर अदालत ने क्या कहा?

SC ST Creamy Layer: सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और जनजाति (SC/ST) के लिए इनकम टैक्स में क्रीमी लेयर की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। कोर्ट ने इसे विधायी नीति का मामला बताया।
SC ST Creamy Layer: Supreme Court Refuses Hearing on Income Tax Plea for SC/ST
सुप्रीम कोर्ट (सोर्स-सोशल मीडिया)
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SC ST Creamy Layer plea: सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए इनकम टैक्स में क्रीमी लेयर लागू करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की पीठ ने इस अहम मामले को सीधे तौर पर विधायी नीति का हिस्सा बताया है। अदालत ने कहा कि इस तरह के नीतिगत फैसले लेना न्यायपालिका का काम नहीं है और हम दखल नहीं देंगे। इसलिए न्यायालय ने याचिकाकर्ता को अपनी बात रखने के लिए संसदीय पिटिशन कमेटी के पास जाने की पूरी छूट दी है।

याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने कोर्ट में दलील दी थी कि आर्थिक रूप से बेहद समृद्ध हो चुके लोगों को भी आरक्षण मिलना समानता के खिलाफ है। उन्होंने अनुच्छेद 14, 19 और 27 का हवाला देते हुए कहा कि संपन्न लोगों को विशेष लाभ मिलते रहना बिल्कुल भी उचित नहीं है। अदालत ने उनकी इन दलीलों को सुनते हुए कहा कि सिर्फ इसलिए कि किसी ने किसी प्रावधान का दुरुपयोग किया है, सब पर शक नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख स्पष्ट करता है कि ऐसे गंभीर कानून बनाने का अधिकार केवल देश की संसद के पास है।

समानता के सिद्धांत का तर्क

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने उत्तर-पूर्वी राज्यों का एक बड़ा उदाहरण अदालत के सामने पेश किया। उन्होंने कहा कि वहां ईसाई धर्म अपना चुके कई आदिवासी समुदाय के लोग बड़ी संख्या में शैक्षणिक संस्थान चलाते हैं। ये लोग करोड़ों रुपये की भारी आय अर्जित करते हैं लेकिन फिर भी विभिन्न विशेष लाभ लगातार प्राप्त करते रहते हैं। इससे संविधान में दिए गए समानता के मूल सिद्धांत का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है जिस पर रोक लगनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने स्पष्ट किया कि केवल कुछ लोगों की गलती की सजा सभी को नहीं दी जा सकती। किसी एक व्यक्ति द्वारा कानून का गलत फायदा उठाने का यह मतलब नहीं है कि पूरे समुदाय पर ही बेवजह संदेह किया जाए। यह मूलतः देश की विधायी नीति और कानून बनाने का विषय है जिसमें न्यायालय सीधा हस्तक्षेप नहीं कर सकता। यह फैसला बताता है कि अदालतें अपनी संवैधानिक सीमाओं का पूरी तरह से सम्मान करती हैं और अपने दायरे में रहती हैं।

संसदीय समिति के पास जाने की सलाह

सुप्रीम कोर्ट ने मामले का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को एक उचित और सही रास्ता भी दिखाया है। कोर्ट ने संकेत दिया कि संसद और उसकी संबंधित समितियां नया कानून बनाने या संशोधन करने का सबसे उचित मंच हैं। मुख्य न्यायाधीश ने भरोसा जताया कि हमारे निर्वाचित जनप्रतिनिधि इस गंभीर विषय से भली-भांति अवगत होंगे। संसद में ऐसी समितियां मौजूद हैं जहां कोई भी नागरिक कानून में सुधार के लिए अपनी महत्वपूर्ण बात रख सकता है।

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