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‘रोहित वेमुला दलित नहीं…’, लेकिन कर्नाटक सरकार उसकी जाति के नाम पर बांटेगी
Karnataka government द्वारा पेश होने वाले रोहित वेमुला विधेयक को सवर्णों के विरुद्ध एक षड्यंत्र माना जा रहा है। कर्नाटक राज्य की 6 प्रतिशत आबादी को खलनायक बनाना देश, राज्य और समाज के लिए खतरनाक है।
- Written By: सौरभ शर्मा

कर्नाटक सरकार द्वारा प्रस्तावित रोहित वेमुला बिल चर्चा में (फोटो- सोशल मीडिया)
Rohith Vemula Bill: कर्नाटक सरकार द्वारा प्रस्तावित ‘रोहित वेमुला बिल’ को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में जबरदस्त बहस छिड़ी है। इस कानून के जरिए ओबीसी, एससी, एसटी और अल्पसंख्यक छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को रोकने के दावे किये जा रहे हैं, लेकिन इसके प्रावधानों को लेकर कई गंभीर आपत्तियां उठ रही हैं। विरोधियों का कहना है कि यह कानून सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को एकतरफा दोषी ठहराने का रास्ता खोल देगा और समाज में जातिगत तनाव को और गहरा करेगा। हालांकि मामले पर अभी राज्य प्रशासन के द्वारा कुछ नहीं कहा गया है।
सरकार द्वारा पेश रोहित वेमुला विधेयक को सवर्णों के विरुद्ध एक षड्यंत्र माना जा रहा है। कर्नाटक राज्य की 6 प्रतिशत आबादी को खलनायक बनाना देश, राज्य और समाज के लिए खतरनाक है। भविष्य में जब रोहित वेमुला एक्ट लागू होगा, तो राज्य में हर मुद्दे पर 94 बनाम 6 के नाम पर दंगे होंगे।
तेलंगाना में दिसंबर 2023 में कांग्रेस की सरकार बनी थी। मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी बने। मई 2024 में रेवंत सरकार ने रोहित वेमुला आत्महत्या मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी। रिपोर्ट में कहा गया कि रोहित वेमुला अनुसूचित जाति से नहीं थे। उन्होंने अपनी पहचान उजागर होने के कारण ही आत्महत्या की थी। साथ ही यह भी बात कही गई अगर यह क्लोजर रिपोर्ट किसी भाजपा सरकार द्वारा जारी की गई होती, तो कहा जाता कि रोहित वेमुला के साथ न्याय नहीं हुआ। लेकिन चूँकि यह रिपोर्ट दलित अधिकारों के लिए सबसे ज़्यादा बयान देने वाले राहुल गांधी व उनकी पार्टी की कांग्रेस सरकार द्वारा ही दाखिल की गई, इसलिए कहा गया कि इस पर कोई सवाल नहीं उठाया गया। मामले को दबा दिया गया। लेकिन अब कर्नाटक सरकार रोहित वेमुला, जिसकी जाति स्वयं विवादास्पद बन चुकी है, उसको पिछड़ी जातियों के उत्पीड़न का पोस्टर बॉय बनाकर जो करने जा रही है, उसको और भी खराब बताया जा रहा है।
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जातिगत संतुलन के नाम पर असंतुलन की आशंका
कर्नाटक सरकार का प्रस्ताव है कि अगर कोई ओबीसी, एससी, एसटी या अल्पसंख्यक छात्र किसी तरह के भेदभाव की शिकायत करता है तो आरोपी शिक्षक या संस्थान प्रमुख पर गैर-जमानती, संज्ञेय अपराध के तहत केस दर्ज होगा। दोषी पाए जाने पर एक साल की जेल और 10,000 जुर्माना तय किया गया है। बार-बार अपराध करने पर सजा तीन साल तक बढ़ सकती है। इसके अलावा सरकारी सहायता भी बंद कर दी जाएगी और पीड़ित को 1 लाख तक का मुआवजा भी मिल सकता है।
सवर्णों के खिलाफ प्लान के साथ राजनीतिक प्रयोग
सोशल मीडिया पर इस बिल की आलोचना करते हुए इसे 6% बनाम 94% की राजनीति कहा जा रहा है। कर्नाटक में दलित, पिछड़ा और मुस्लिम वोट बैंक को साधने की कोशिश के तहत इस कानून को कांग्रेस का जातिगत ध्रुवीकरण का हथियार माना जा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने खुद सीएम सिद्धारमैया को इसे जल्द लाने का सुझाव दिया है। लेकिन बीजेपी और अन्य संगठनों का दावा है कि ये कानून ब्राह्मण और सामान्य वर्ग के खिलाफ एकतरफा कार्रवाई का रास्ता खोलता है।
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क्या शैक्षणिक संस्थानों पूरी तरह से कठपुतली बनेंगे
इस बिल में जो सबसे बड़ा विवाद है, वो है कॉलेज और यूनिवर्सिटीज़ की स्वायत्तता पर असर। अगर कोई शिकायत होती है और कार्रवाई नहीं की जाती, तो संस्था के प्रमुख को भी सजा भुगतनी पड़ सकती है। इससे शिक्षा जगत पर राजनीतिक दखलंदाजी बढ़ेगी और विश्वविद्यालय भय के माहौल में काम करेंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे संस्थानों की निष्पक्षता और स्वतंत्रता प्रभावित होगी, और शिक्षा की गुणवत्ता पर भी असर पड़ेगा।
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