Rani Durgavati Biography Achievements Gond Queen: जब सामने एक बड़ी और ताकतवर मुगल सेना हो, तब भी एक शासक युद्ध का मैदान छोड़ने से इनकार कर दे, रानी दुर्गावती की कहानी कुछ ऐसी ही है। चंदेल राजघराने में जन्मी इस वीरांगना ने विवाह के बाद गोंड राज्य की बागडोर संभाली और अपनी सूझबूझ से शासन चलाया। उन्होंने राज्य की व्यवस्था मजबूत करने के साथ जनता के हित में कई काम किए। युद्ध के मैदान में भी उनका साहस देखने को मिला।
मालवा के शासक बाज बहादुर की सेना को पीछे हटाने के बाद उनका सामना मुगल सेना से हुआ। 1564 में नर्राई के युद्ध में रानी दुर्गावती ने पूरी ताकत से मुकाबला किया। तीर लगने से घायल होने और हालात बिगड़ने के बावजूद उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया। आखिरकार उन्होंने अपनी कटार से आत्मबलिदान कर दिया। उनकी यह कहानी आज भी साहस, स्वाभिमान और आखिरी दम तक संघर्ष की मिसाल मानी जाती है। तो आइए जानते हैं रानी दुर्गावती के जीवन, वीरता, शासन और बलिदान से जुड़ी खास बातें।
रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को चंदेल शासक कीरत राय के घर हुआ था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्थित कलंजर किले में हुआ था। चंदेल वंश अपनी वीरता और कला के लिए जाना जाता था।
इसी वंश के राजा विद्याधर ने महमूद गजनवी के हमलों का सामना किया था। खजुराहो और कालिंजर की ऐतिहासिक धरोहरें भी चंदेलों की कला के प्रति रुचि को दिखाती हैं। आगे चलकर रानी दुर्गावती ने भी इसी परंपरा को अपनी वीरता और शासन क्षमता से आगे बढ़ाया।
साल 1542 में रानी दुर्गावती का विवाह गोंड शासक संग्रामशाह के बड़े बेटे दलपतशाह से हुआ। इस शादी के बाद चंदेल और गोंड राजवंशों के संबंध और मजबूत हुए। जब शेरशाह सूरी ने कलंजर पर हमला किया, तब कीरत राय को गोंडों और उनके दामाद दलपतशाह का साथ मिला। इसी संघर्ष में शेरशाह सूरी की मौत हो गई।
1545 में रानी दुर्गावती ने एक बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम वीर नारायण रखा गया। कुछ साल बाद 1550 में दलपतशाह का निधन हो गया। उस समय वीर नारायण काफी छोटे थे। ऐसे में राज्य की जिम्मेदारी रानी दुर्गावती ने संभाली।
रानी ने अपने शासन में अधर कायस्थ और मान ठाकुर जैसे मंत्रियों की मदद ली। उन्होंने प्रशासन को मजबूत किया और राज्य की व्यवस्था पर खुद नजर रखी। रानी ने अपनी राजधानी सिंगौरगढ़ से हटाकर चौरागढ़ कर दी।
सतपुड़ा की पहाड़ियों में स्थित होने के कारण चौरागढ़ रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण था।रानी के शासन में राज्य की आर्थिक और प्रशासनिक स्थिति मजबूत हुई। उन्होंने जनता की जरूरतों का ध्यान रखा और कई जलाशयों का निर्माण भी कराया। विद्वानों को संरक्षण देने के साथ उन्होंने अलग-अलग समुदायों के लोगों को शासन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दीं।
शेरशाह सूरी की मौत के बाद मालवा की राजनीति में भी बदलाव आया। सुजात खान के बाद 1556 में उसका बेटा बाज बहादुर मालवा का शासक बना। बाज बहादुर ने रानी दुर्गावती के राज्य पर हमला किया,
लेकिन रानी की सेना ने उसका मुकाबला करते हुए उसे पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। इस लड़ाई में बाज बहादुर की सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इस जीत के बाद रानी दुर्गावती की सैन्य क्षमता और उनकी पहचान दूर तक पहुंची।
1562 में अकबर ने मालवा पर कब्जा कर उसे मुगल साम्राज्य में मिला लिया। इसके बाद रानी दुर्गावती का राज्य मुगल सीमा के करीब आ गया। इसी दौरान मुगल अधिकारी आसफ खान की नजर रानी के समृद्ध राज्य पर पड़ी। उसने मुगल सम्राट की अनुमति लेकर गोंड राज्य पर हमला कर दिया।
रानी को जब मुगल सेना के आने की खबर मिली तो उन्होंने पीछे हटने के बजाय मुकाबला करने का फैसला किया। उनके मंत्री अधर ने मुगल सेना की ताकत का हवाला देकर सावधानी बरतने की सलाह दी थी, लेकिन रानी ने आत्मसमर्पण करना स्वीकार नहीं किया।
उन्होंने युद्ध के लिए नर्राई घाटी को चुना। एक तरफ पहाड़ियां थीं और दूसरी ओर गौर और नर्मदा नदी थी। इस जगह का फायदा उठाकर रानी की सेना ने मुगल सैनिकों पर हमला किया। शुरुआती संघर्ष में रानी की सेना को सफलता मिली और मुगल सैनिकों को पीछे हटना पड़ा। इस लड़ाई में रानी के फौजदार अर्जुन दास शहीद हो गए, जिसके बाद रानी ने खुद सेना की कमान संभाली।
पहली जीत के बाद रानी ने अपने सलाहकारों के साथ आगे की रणनीति पर चर्चा की। वह रात में हमला कर मुगल सेना को कमजोर करना चाहती थीं, लेकिन उनके सेनापतियों ने इस योजना पर सहमति नहीं जताई। अगले दिन आसफ खान अपनी बड़ी तोपों के साथ फिर युद्ध के मैदान में पहुंच गया।
रानी दुर्गावती अपने हाथी सरमन पर सवार होकर युद्ध में उतरीं। उनके बेटे वीर नारायण ने भी लड़ाई में हिस्सा लिया। वीर नारायण ने मुगल सेना को कई बार पीछे हटने पर मजबूर किया, लेकिन बाद में वह घायल हो गए और उन्हें युद्ध से बाहर ले जाया गया।
इसी दौरान रानी के कान के पास एक तीर लगा। इसके बाद दूसरा तीर उनकी गर्दन में आ लगा और वह कुछ समय के लिए बेहोश हो गईं। जब उन्हें होश आया तो उन्हें समझ में आ गया कि स्थिति उनके पक्ष में नहीं है। महावत ने उन्हें सुरक्षित जगह ले जाने की सलाह दी, लेकिन रानी ने युद्ध का मैदान छोड़ने से इनकार कर दिया।
उन्होंने दुश्मन के सामने झुकने के बजाय अपनी कटार से खुद को बलिदान कर दिया। 24 जून 1564 को रानी दुर्गावती ने अपने प्राण न्योछावर किए। उनकी शहादत की याद में हर साल यह दिन बलिदान दिवस के रूप में मनाया जाता है।
रानी दुर्गावती सिर्फ एक योद्धा के तौर पर ही नहीं, बल्कि एक कुशल शासक के रूप में भी याद की जाती हैं। उन्होंने राज्य में कई तालाब और जलाशय बनवाए। जनता की सुविधाओं और कल्याण से जुड़े कामों पर ध्यान दिया। वह विद्वानों का सम्मान करती थीं और उन्हें संरक्षण देती थीं।
रानी ने धार्मिक मामलों में भी उदार रवैया अपनाया। उन्होंने वल्लभ संप्रदाय के संत विट्ठलनाथ का स्वागत किया और उनसे दीक्षा ली। उनके शासन में कई प्रतिष्ठित मुस्लिम लोगों को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गईं।
रानी दुर्गावती ने जिस जगह अपने प्राणों का बलिदान दिया, वह आज भी उनकी वीरता की याद दिलाता है। उनका जीवन साहस, स्वाभिमान और अपने राज्य की रक्षा के लिए आखिरी समय तक लड़ने की मिसाल माना जाता है।
उनकी स्मृति को सम्मान देते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने 1983 में जबलपुर विश्वविद्यालय का नाम बदलकर रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय रखा। इसके बाद भारत सरकार ने 24 जून 1988 को रानी दुर्गावती की शहादत की याद में डाक टिकट भी जारी किया। रानी दुर्गावती का जीवन यह बताता है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी उन्होंने अपने सम्मान और अपने राज्य की रक्षा से समझौता नहीं किया।