129th Birth Anniversary: क्रांति, कविता और बलिदान का दूसरा नाम था- बिस्मिल Ram Prasad
Ram Prasad Bismil History: पंडित राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ ने भारत की आज़ादी के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। महज़ 30 वर्ष की आयु में हंसते-हंसते फांसी को गले लगा लिया। ऐसे बलिदानी को शत-शत नमन।
- Written By: स्निग्धा श्रीवास्तव
राम प्रसाद बिस्मिल (सोर्स- सोशल मीडिया)
Ram Prasad Bismil Biography: मैनपुरी षड्यंत्र और काकोरी कांड के महानायक अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल की आज 129वीं जयंती है। निर्जला एकादशी के दिन जन्में बिस्मिल हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए थे। क्रांतिकारी बिस्मिल अपने जोशीले शब्दों से आजादी की चिंगारी को हवा देने का काम करते थे। उनकी कविताओं ने गुलाम भारत के दिलों में आजादी की लौ जला रखी थी। बिस्मिल की वीरता की कहानी आज भी सुनाई और पढ़ाई जाती है। इनके रोम-रोम में वीरता बसी थी। आज भारत के इस महान स्वतंत्रता सेनानी और ‘सरफरोशी की तमन्ना’ जैसी अमर रचना के रचयिता की जयंती पर जानते है उनके जीवन की कुछ खास बातें-
जीवन परिचय
शहीद राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 को यूपी के शाहजहांपुर में राजपूत परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम मुरलीधर था और मा का नाम मूलमती था। बचपन से पढ़ने इनका मन नही लगता था। इसलिए इनके पिता ने इनका दाखिला उर्दू स्कूल में करा दिया था। उर्दू मिडिल स्कूल से इन्होंने प्रारंभिक पढ़ाई पूरी की।
काकोरी कांड में मिली सजा
राम प्रसाद ने देश को आजाद कराने के लिए हिन्दुस्तान रिपब्लिकन पार्टी का दामन थामा था। 9 अगस्त 1925 को काकोरी नामक जगह पर ब्रिटिश हुकूमत के खजाने को लूट लिया। जिसके बाद जांच होने पर बिस्मिल, अशफाक उल्लाह खान, रौशन सिंह और राजेन्द्र लहरी को सामूहिक रुप से फांसी की सजा सुनाई गई थी। बिस्मिल को फांसी के लिए गोरखपुर जेल लाया गया और 19 दिसम्बर 1927 की सुबह 6 बजे उन्हें फांसी पर लटका दिया गया।
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एकादशी के दिन ही दी गई फांसी
शहीद राम प्रसाद बिस्मिल को 30 साल की उम्र में अंग्रेजी हूकुमत द्वारा जब फांसी पर लटकाया जा रहा था तब भी वे शायरी ही गुनगुनाया रहे थे। जिस दिन इनका जन्म हुआ, उस दिन निर्जला एकादशी थी। जबकि ‘बिस्मिल’ की शहादत के दिन सफला एकादशी थी। खास बात यह है कि आज उनकी 129वीं जयंती पर भी परमा एकादशी है।
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फांसी पहले पूरी की थी आत्मकथा
अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में फांसी के तीन दिन पहले ही बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा का आखिरी अध्याय पूरा किया था। 30 साल के जीवनकाल में राम प्रसाद की कुल 11 पुस्तकें प्रकाशित हुईं थीं ज्यादातर अंग्रेजों ने नष्ट करा दीं थी।
विदेशों तक पहुंची बिस्मिल की बहादुरी और लेखनी
राम प्रसाद बिस्मिल की बहादुरी और लेखनी का असर भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों तक भी पहुंचा था। तुर्की के क्रांतिकारी और आधुनिक तुर्की गणराज्य के संस्थापक मुस्तफा कमाल पाशा उनके प्रशंसकों में से एक थे। तुर्की में उन्हें सम्मान देने के लिए 1936 में, ‘बिस्मिल’ नाम का एक शहर भी बसाया गया।
राम प्रसाद बिस्मिल का जीवन मात्र एक क्रांति तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने अपने विचारों, कविताओं और बलिदान से करोड़ों भारतीयों को देश प्रेम के लिए प्रेरित किया।
देश के इस वीर सपूत को शत-शत नमन, जिन्होंने खुशी-खुशी देश के लिए फांसी को अपने गले लगा लिया।
“सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाजुए-कातिल में है।”
यह पंक्तियां आज भी भारतीय के दिल में बिस्मिल को जिंदा रखती हैं और देश प्रेम के लिए युवाओं को प्रेरित करती है।
