कुलदेवी का दूत था महात्मा गांधी का हत्यारा? इस वजह से नाथूराम पड़ा नाम, यहां पढ़ें गोडसे की अनटोल्ड स्टोरी
आज नाथूराम गोडसे का जन्मदिन इस बहस से दूर आज हम आपको उसकी जिंदगी से जुड़े कुछ रोचक किस्से बताने वाले हैं। इन किस्सों का जिक्र मनोहर मालगांवकर की किताब 'द मैन हू किल्ड गांधी में किया गया है...
- Written By: अभिषेक सिंह
नाथूराम गोडसे (डिजाइन फोटो)
नागपुर: नाथूराम गोड़से को महात्मा गांधी के हत्यारे के तौर पर जाना जाता है। लेकिन राजनैतिक गलियारों में तमाम लोग उसे देशभक्त के रूप में देखते हैं। आज यानी 19 मई को नाथूराम का जन्मदिन है। हो सकता है कुछ संगठन इस बार भी गोडसे का जन्मदिन मनाएं क्योंकि बीते सालों में ऐसा होता रहा है।
खैर! नाथूराम गोडसे देशभक्त था या हत्यारा…? कौन उसका जन्मदिन मनाएगा कौन नहीं? इस बहस से दूर आज हम आपको उसकी जिंदगी से जुड़े कुछ रोचक किस्से बताने वाले हैं। इन किस्सों का जिक्र मनोहर मालगांवकर की किताब ‘द मैन हू किल्ड गांधी में किया गया है। तो चलिए जानते हैं…
जन्म और शुरुआती जीवन
नाथूराम गोडसे का पूरा नाम नाथूराम विनायक गोडसे था। उनका जन्म 19 मई 1910 को एक मध्यम वर्गीय चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता विनायक गोडसे भारतीय डाक विभाग में काम करते थे। पूरा परिवार पुणे के पास एक गाँव में रहता था।
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इसलिए नाथूराम पड़ा नाम
पुस्तक में दावा किया गया है कि नाथूराम को बचपन से ही लड़कियों की तरह पाला गया था। वह नाक में नथनी पहनते थे। बचपन में उनका नाम रामचंद्र रखा गया था। नथनी पहनने की वजह से उनका नाम नाथूराम रखा गया।
नाथूराम गोडसे (सोर्स-सोशल मीडिया)
जब नाथूराम के पिता विनायक 17 साल के थे, तब उनकी शादी 10 साल की लड़की से कर दी गई थी। शादी के बाद उन्हें एक बेटा हुआ। 2 साल बाद उसकी मौत हो गई। इसके बाद एक बेटी भी हुई जो बच गई। फिर उनके 2 और बेटे हुए जो मर गए। परिवार के लोगों में यह मान्यता थी कि परिवार पर लगे किसी श्राप की वजह से उनके बेटे जीवित नहीं रह पाए।
ज्योतिषी ने दी ये सलाह
ज्योतिषी ने परिवार को सुझाव दिया कि अगर वे लड़के को लड़की की तरह पालेंगे तो वह जीवित रहेगा। किताब के अनुसार विनायक और उनकी पत्नी ने भगवान से प्रार्थना की कि अगर उन्हें लड़का हुआ तो वे उसे लड़की की तरह पालेंगे। 19 मई 1910 को उनके घर एक लड़का पैदा हुआ और माता-पिता ने उसका नाम रामचंद्र रखा।
कुलदेवी का दूत मानता था परिवार
परिवार के लोग उसे कुलदेवी का दूत मानते थे। ज्योतिषी की सलाह के अनुसार परिवार ने रामचंद्र की नाक छिदवा दी और उसे नथ पहना दी। इस वजह से लोग उसे नाथूराम कहने लगे। कहा जाता है कि लोग उसे लड़कियों की तरह रहने के लिए चिढ़ाते थे। परिवार के अनुसार बचपन में वह कुलदेवी के सामने ध्यान में बैठा रहता था और कुलदेवी उसके माध्यम से उत्तर देती थीं।
10वीं में फेल हुआ था गोडसे
किताब के अनुसार 16 साल की उम्र तक नाथूराम काफी बदल गया था। वह धर्म को छोड़कर दुनिया के दूसरे मामलों में दिलचस्पी लेने लगा था। उसे तैराकी का शौक था और वह सामाजिक कार्यों में भी रुचि लेने लगा था। नाथूराम पढ़ाई में बहुत अच्छा नहीं था और 10वीं कक्षा में फेल हो गया था।
गांधी की हत्या का नहीं था अफसोस
नाथूराम की रुचि इतिहास और पौराणिक कथाओं में थी। बाद में वह वीर सावरकर के विचारों से प्रभावित हुआ। महात्मा गांधी की हत्या के आरोप में उसे 15 नवंबर 1949 को 39 साल की उम्र में फांसी पर लटका दिया गया। हत्या के बाद नाथूराम ने अदालत में जो पक्ष रखा, उसके अनुसार वह गांधीजी को भारत के विभाजन के लिए जिम्मेदार और मुसलमानों का हितैषी मानता था। वह उन्हें हिंदुओं के विनाश के लिए जिम्मेदार मानता था और उसकी हत्या का उसे कोई अफसोस नहीं था।
