क्यों महाभियोग पूरा होने से पहले जज छोड़ देते हैं पद? जस्टिस वर्मा से पहले किन जजों ने दिया इस्तीफा, पूरी कहानी
Justice Yashwant Varma ने महाभियोग से पहले राष्ट्रपति को सौंपा इस्तीफा। 15 करोड़ कैश बरामदगी के आरोपों के बीच छोड़ा पद। इसके साथ ही संसद की कार्यवाही समाप्त, पेंशन लाभ रहेंगे बरकरार।
- Written By: अर्पित शुक्ला
पी.डी. दिनाकरन, सौमित्र सेन, यशवंत वर्मा (Image- Social Media)
Justice Yashwant Varma Resignation: यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है, ठीक उस समय जब उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने वाली थी। 9 अप्रैल को उन्होंने अपना इस्तीफा सीधे द्रौपदी मुर्मू को सौंप दिया। इसके साथ ही संसद में प्रस्तावित महाभियोग की कार्यवाही स्वतः समाप्त हो गई। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में यह तीसरा मौका है जब किसी कार्यरत जज ने महाभियोग प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही इस्तीफा दिया है।
पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
सौमित्र सेन (कलकत्ता हाई कोर्ट): 2011 में फंड हेराफेरी के आरोप लगे। राज्यसभा ने उनके खिलाफ प्रस्ताव पास किया, लेकिन लोकसभा में वोटिंग से पहले उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
पी.डी. दिनाकरन (सिक्किम हाई कोर्ट): 2011 में कदाचार के आरोपों के बीच जांच शुरू होने से पहले ही उन्होंने पद छोड़ दिया।
इस्तीफा देने से क्या होता है?
भारत में किसी जज को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास होना जरूरी होता है। लेकिन अगर जज पहले ही इस्तीफा दे दे, तो महाभियोग की प्रक्रिया खत्म हो जाती है। ऐसे मामलों में जज को रिटायरमेंट के सभी लाभ जैसे पेंशन मिलते रहते हैं, क्योंकि मौजूदा कानून में इन्हें रोकने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
सम्बंधित ख़बरें
CUET परीक्षा में तकनीकी खराबी के बाद NTA ने मांगी माफी, जारी किया नया शेड्यूल, नोट कर लें हेल्पलाइन नंबर
हड़प्पाकालीन पशुपति सील पर अमेरिकी इतिहासकार के दावे पर भड़के भारतीय संत, दिया करारा जवाब, देखें VIDEO
सड़क पर नमाज गलत, तो बाकी त्योहार क्यों नहीं? ओवैसी का सरकार से सवाल, बोले- मुसलमानों को दबाया जा रहा
उत्तर प्रदेश में महंगी हुई बिजली, उपभोक्ताओं को लगा बड़ा झटका, इतने प्रतिशत बढ़े दाम
पूरा मामला क्या था?
यह विवाद मार्च 2025 का है, जब जस्टिस वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट में कार्यरत थे। उनके सरकारी आवास के एक स्टोररूम में आग लगने के बाद वहां से कथित तौर पर बड़ी मात्रा में जला हुआ नकद (करीब 15 करोड़ रुपये) बरामद हुआ। जस्टिस वर्मा ने इन आरोपों से इनकार किया और कहा कि घटना के समय वे शहर में मौजूद नहीं थे। मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस कमेटी ने की।
जांच के बाद उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया और उनके न्यायिक कार्य भी वापस ले लिए गए। बाद में लोकसभा के 100 से अधिक सांसदों ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किया, जिसके बाद जांच समिति गठित की गई। हालांकि, समिति की रिपोर्ट आने से पहले ही जस्टिस वर्मा ने एक विस्तृत पत्र लिखकर जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए और इसे पक्षपातपूर्ण बताया।
यह भी पढ़ें- यूरेनियम आयात का झंझट खत्म! कल्पक्कम का PFBR भारत को …बनाएगा परमाणु महाशक्ति? US-चीन भी रह गए पीछे
अब आगे क्या होगा?
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, इस्तीफे के बाद महाभियोग की प्रक्रिया समाप्त मानी जाती है। इसका मतलब है कि अब इस मामले में संसद की कार्रवाई आगे नहीं बढ़ेगी और जस्टिस वर्मा को रिटायरमेंट के सभी लाभ मिलते रहेंगे।
