कॉन्सेप्ट फोटो (डिजाइन)
Chabahar Port: भारत अमेरिका के दबाव में ईरान में चाबहार बंदरगाह पर अपना काम बंद कर देगा। इस ख़बर के सामने आते ही सियासी बवाल मच गया। विपक्षी दलों के नेताओं ने इसे मुद्दा बनाते हुए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को घेरना शुरू कर दिया। कहा गया डोनाल्ड ट्रंप के डर से पीएम मोदी पीछे हट रहे हैं। जब बवाल बढ़ा तो विदेश मंत्रालय ने कमान संभाल ली।
विदेश मंत्रालय ने अब इन रिपोर्ट्स का खंडन किया और कहा है कि भारत इस मामले पर अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखेगा। ईरान का चाबहार बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “भारत अपनी भागीदारी के संबंध में कई विकल्पों पर विचार कर रहा है।”
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकी दी थी। इसके बाद कई मीडिया रिपोर्ट्स में सुझाव दिया गया कि भारत चाबहार बंदरगाह परियोजना से खुद को अलग कर सकता है। विदेश मंत्रालय ने अब साफ किया है कि भारत चाबहार बंदरगाह पर काम जारी रखने के तरीकों को लेकर अमेरिका और ईरान दोनों के साथ बातचीत कर रहा है।
दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले सितंबर में ईरान पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे। हालांकि, भारत को चाबहार बंदरगाह परियोजना के संबंध में छह महीने की छूट दी गई थी। यह छूट इस साल 26 अप्रैल को खत्म होने वाली है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “जैसा कि आप जानते हैं, 28 अक्टूबर को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने एक पत्र जारी किया था जिसमें 26 अप्रैल, 2026 तक वैध सशर्त प्रतिबंधों में छूट के बारे में दिशानिर्देश दिए गए थे। हम इस व्यवस्था को लागू करने के लिए अमेरिकी पक्ष के साथ बातचीत कर रहे हैं।” विदेश मंत्री एस जयशंकर अगले महीने अपने अमेरिकी समकक्ष से भी मिल सकते हैं।
चाबहार बंदरगाह (सोर्स- सोशल मीडिया)
विदेश मंत्रालय के बयान के बाद यह साफ है कि भारत के चाबहार बंदरगाह परियोजना से पीछे हटने की अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। भारत अभी भी अमेरिका के साथ बातचीत कर रहा है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उसे चाबहार के संबंध में वही छूट मिलती रहे।
अमेरिका ने ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर टैरिफ लगाने की धमकी दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि ईरान के साथ उसका व्यापार बहुत सीमित है। शुक्रवार को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भी इस बात पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत और ईरान के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 1.6 बिलियन डॉलर है, जिसमें 1.2 बिलियन डॉलर का भारतीय निर्यात और 0.4 बिलियन डॉलर का आयात शामिल है।
चाबहार बंदरगाह परियोजना से जुड़ा पूरा विवाद इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के बाद शुरू हुआ। रिपोर्ट में सरकारी सूत्रों का हवाले से लिखा गया कि भारत चाबहार बंदरगाह परियोजना से जुड़े सीधे जोखिमों को कम करने के लिए लगभग 120 मिलियन अमेरिकी डॉलर ट्रांसफर करने की प्रक्रिया में है। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि चाबहार बंदरगाह के विकास को आगे बढ़ाने के लिए एक नई संस्था बनाने की संभावना पर विचार किया जा रहा है।
भारत 2003 से चाबहार बंदरगाह को विकसित करने के लिए बातचीत कर रहा था। हालांकि, 2015 में भारत और ईरान ने एक समझौता ज्ञापन पर साइन किए। भारत ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के जवाब में चाबहार बंदरगाह को विकसित कर रहा है। यह भारत के लिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंचने का एक महत्वपूर्ण केंद्र है।
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चाबहार बंदरगाह इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) से जुड़ा हुआ है, जो 7,200 किलोमीटर लंबा मल्टी-मॉडल ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट है। यह रास्ता भारत को ईरान, अफगानिस्तान, आर्मेनिया, अजरबैजान, रूस, मध्य एशिया और यूरोप तक सामान पहुंचाने की सुविधा देता है।
Ans: नहीं, विदेश मंत्रालय ने साफ किया है कि भारत चाबहार बंदरगाह परियोजना से पीछे हटने पर कोई फैसला नहीं किया गया है। भारत इस मुद्दे पर अमेरिका और ईरान दोनों के साथ बातचीत कर रहा है और परियोजना को जारी रखने के विकल्पों पर विचार कर रहा है।
Ans: चाबहार बंदरगाह भारत को पाकिस्तान को बाइपास कर अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरोप तक पहुंच देता है। यह बंदरगाह इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का अहम हिस्सा है और रणनीतिक रूप से पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह का जवाब माना जाता है।
Ans: विशेषज्ञों के मुताबिक भारत पर इसका सीमित असर होगा, क्योंकि भारत-ईरान द्विपक्षीय व्यापार लगभग 1.6 बिलियन डॉलर का ही है। इसके अलावा भारत को चाबहार परियोजना के लिए पहले भी प्रतिबंधों से छूट मिलती रही है, जिसे आगे बढ़ाने के लिए बातचीत जारी है।