सांकेतिक तस्वीर (Image- Social Media)
Strategic Petroleum Reserve India: भारत के रणनीतिक तेल भंडार को लेकर एक अहम जानकारी सामने आई है। एक विश्लेषण के मुताबिक, देश के पास मौजूद रणनीतिक भंडार मौजूदा खपत के हिसाब से सिर्फ करीब पांच दिन की मांग ही पूरी कर सकते हैं, क्योंकि कुल क्षमता का एक बड़ा हिस्सा अभी खाली पड़ा है।
कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (CAG) की 2025 की ऑडिट रिपोर्ट में भी यह सामने आया है कि इन भंडारण सुविधाओं का वर्षों से पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है। इस बीच ईंधन की कमी की आशंका के चलते कई शहरों में लोगों ने घबराहट में पेट्रोल-डीजल की खरीद बढ़ा दी, हालांकि केंद्र सरकार ने साफ कहा है कि देश में पर्याप्त स्टॉक मौजूद है।
राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भरोसा दिलाया कि भारत के पास कच्चे तेल का पर्याप्त भंडार है और सरकार ने आयात के स्रोतों को भी विविध बनाया है। वहीं पेट्रोलियम राज्य मंत्री सुरेश गोपी के अनुसार, मौजूदा समय में कच्चे तेल का भंडार कुल क्षमता का लगभग 64% भरा हुआ है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में स्थित तीन स्थानों पर भारत के पास 5.33 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) कच्चा तेल रखने की क्षमता है, जिसमें से लगभग 3.37 MMT ही भरा हुआ है। इन भंडारों का संचालन इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड (ISPRL) करती है।
भारत हर महीने करीब 20 MMT पेट्रोलियम उत्पादों की खपत करता है, यानी रोजाना लगभग 0.67 MMT। इस हिसाब से मौजूदा रणनीतिक भंडार सिर्फ पांच दिन के लिए पर्याप्त हैं। हालांकि, अगर तेल विपणन कंपनियों के पास मौजूद स्टॉक को भी जोड़ लिया जाए, तो देश के पास कुल मिलाकर करीब 74 दिनों की मांग के बराबर भंडार है। इसमें ISPRL की क्षमता लगभग 9.5 दिन की मानी जाती है।
मौजूदा रणनीतिक भंडार
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल उपभोक्ता है और अपनी जरूरतों का 88% से ज्यादा आयात करता है। 2025 में देश के आधे से ज्यादा आयात मध्य-पूर्व के देशों इराक, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से आए। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह का संकट भारत की आपूर्ति पर सीधा असर डाल सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि रणनीतिक भंडार आपात स्थिति या कीमतों में अचानक उछाल के समय सुरक्षा कवच की तरह काम करते हैं। आईसीआरए के वरिष्ठ अधिकारी प्रशांत वशिष्ठ के मुताबिक, भारत के भंडार अभी भी कम हैं और आयात पर ज्यादा निर्भरता इसे एक कमजोरी बनाती है।
वहीं ऊर्जा विशेषज्ञ किरीट पारिख का मानना है कि सिर्फ भंडार बढ़ाना ही समाधान नहीं है, बल्कि तेल की मांग कम करने और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने पर भी तेजी से काम करने की जरूरत है।
CAG रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भंडारण क्षमता बढ़ाने की रफ्तार धीमी रही है। मार्च 2024 तक 19 दिन के आयात को कवर करने का लक्ष्य था, लेकिन अब तक सिर्फ 7.88 दिन की क्षमता ही विकसित हो पाई है।
वैश्विक स्तर पर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) 90 दिन के आयात के बराबर भंडार रखने की सिफारिश करती है। तुलना करें तो जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के पास 200 दिन के आसपास का भंडार है, जबकि चीन के पास करीब 120 दिन का स्टॉक माना जाता है। इसके मुकाबले भारत की कुल क्षमता 74 दिन ही है।
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हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि बड़े पैमाने पर तेल भंडारण करना महंगा सौदा होता है, खासकर तब जब कच्चे तेल की कीमतें ऊंची हों। इसलिए सही समय पर भंडार बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है।