प्रतीकात्मक फोटो, सोर्स- AI
Global Energy Crisis: दुनिया भर के ऊर्जा बाजारों में इस समय हड़कंप मचा हुआ है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और संघर्ष की खबरों ने कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल की कीमतों को $100 प्रति बैरल के पार पहुंचा दिया है। यह कोई मामूली बढ़त नहीं है, बल्कि एक ऐसा संकट है जो सीधे तौर पर आपकी जेब और देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होता है, तो उसका असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों से लेकर माल ढुलाई और अंततः खाने-पीने की चीजों के दामों पर भी पड़ता है। होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव ने वैश्विक सप्लाई चेन की चूलें हिला दी हैं, जिससे आने वाले दिनों में महंगाई का एक बड़ा झटका लगने की आशंका गहरा गई है।
तेल बाजारों में इस हफ्ते जो मंजर देखा गया, वह पिछले चार दशकों में विरला ही रहा है। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमतें $110 प्रति बैरल के करीब पहुंच चुकी हैं। अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड में करीब 20.75 प्रतिशत की भारी उछाल आई है और यह $109.75 पर जा टिका है। वहीं, ब्रेंट क्रूड भी पीछे नहीं है और यह 18 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़त के साथ $109.48 प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि 1980 के दशक की शुरुआत के बाद तेल वायदा कारोबार में यह अब तक के सबसे बड़े साप्ताहिक उछालों में से एक है। कीमतों में यह बेतहाशा बढ़ोतरी इसलिए हो रही है क्योंकि मध्य पूर्व के बड़े तेल उत्पादकों ने उत्पादन में कटौती कर दी है और होर्मुज के रास्ते होने वाली सप्लाई लगभग ठप हो गई है। एक आम नागरिक के लिए इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट और गहरा सकता है।
इस पूरे संकट के केंद्र में है ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’, जो दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्ग माना जाता है। वैश्विक तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। क्षेत्र में हो रहे मिसाइल और ड्रोन हमलों के डर से तेल टैंकरों की रफ्तार काफी धीमी पड़ गई है और कई जहाजों ने तो इस इलाके से गुजरने से ही तौबा कर ली है।
स्थिति कितनी विकट है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि खाड़ी क्षेत्र के तेल उत्पादकों के पास भंडारण टैंक भरने लगे हैं। चूंकि निर्यात के रास्ते बंद हैं, इसलिए कई कंपनियों को मजबूरन अपने तेल के कुओं को बंद करना पड़ रहा है या उत्पादन की गति बेहद धीमी करनी पड़ रही है। ऊर्जा इतिहासकार डेनियल येर्गिन ने चेतावनी दी है कि यह स्थिति रोजाना तेल उत्पादन के लिहाज से दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा व्यवधान बन सकती है।
तेल की इस तपिश ने केवल सड़कों पर चलने वाले वाहनों को ही नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय बाजारों को भी झुलसा दिया है। जैसे ही सोमवार को एशियाई बाजार खुले, वहां बिकवाली का दौर शुरू हो गया। जापान का बेंचमार्क इंडेक्स लगभग 5 प्रतिशत गिर गया, जबकि दक्षिण कोरिया के शेयर बाजार में 7 प्रतिशत से अधिक की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। ये दोनों ही देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह से आयातित तेल और गैस पर निर्भर हैं, इसलिए वहां मंदी का डर सबसे ज्यादा है।
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विश्लेषकों की भविष्यवाणियां और भी चिंताजनक हैं। यदि मध्य पूर्व का यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो बाजार के कुछ अनुमानों के अनुसार इस साल के अंत तक कच्चा तेल $143 प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। ऊर्जा के लिए फारस की खाड़ी पर निर्भर रहने वाले एशिया और यूरोप के देशों पर इसका सबसे विनाशकारी असर पड़ सकता है।
इस संकट पर प्रतिक्रिया देते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे ईरान के परमाणु खतरे का सामना करने की एक ‘अस्थायी कीमत’ बताया है। उनका तर्क है कि एक बार खतरा खत्म होने के बाद कीमतें वापस सामान्य हो जाएंगी। हालांकि, अमेरिका अपने घरेलू उत्पादन और निर्यात के कारण थोड़ा सुरक्षित जरूर है, लेकिन वैश्विक कीमतों में वृद्धि का असर वहां के उपभोक्ताओं पर भी पड़ना तय है।
इतिहास गवाह है कि जब भी फारस की खाड़ी में इस तरह के संकट आए हैं, दुनिया ने आर्थिक तबाही देखी है। 1973 का अरब तेल प्रतिबंध हो या 1979 की ईरानी क्रांति, हर बार तेल की कीमतों में आए उछाल ने वैश्विक मंदी का रास्ता तैयार किया था। वर्तमान हालात भी कुछ वैसी ही ओर इशारा कर रहे हैं, जहां सप्लाई बाधित है, मांग बनी हुई है और तनाव चरम पर है।