होसबले के बयान के बीच उपराष्ट्रपति धनखड़ बोले- संविधान की आत्मा से छेड़छाड़ नहीं
RSS ने 'धर्मनिरपेक्ष' व 'समाजवादी' शब्दों की प्रस्तावना में उपयुक्तता पर बहस की मांग की थी। तो अब इस पर उपराष्ट्रपति धनखड़ ने कहा कि ये बदलाव आपातकाल में हुए जो मूल संविधान की भावना से भटके है।
- Written By: सौरभ शर्मा
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ (फोटो- सोशल मीडिया)
नई दिल्ली: भारत की राजनीति में एक बार फिर संविधान की प्रस्तावना को लेकर गर्मा-गर्म बहस छिड़ी हुई है। RSS सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले के समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्दों को हटाने की बहस की वकालत पर अब उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि संविधान की प्रस्तावना में कोई भी बदलाव संभव नहीं है, क्योंकि यह संविधान की आत्मा है। उन्होंने आपातकाल के दौरान प्रस्तावना में हुए बदलावों को ‘लोकतंत्र के काले अध्याय’ से जोड़ा।
आरएसएस महासचिव दत्तात्रेय होसबले ने हाल ही में इस विषय पर राष्ट्रीय बहस की मांग करते हुए कहा था कि समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्द संविधान की मूल आत्मा का हिस्सा नहीं थे और इन्हें आपातकाल के दौरान जोड़ा गया। उन्होंने इसे राजनीतिक अवसरवाद बताया। वहीं, उपराष्ट्रपति ने शनिवार को एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में कहा, भारत जैसे देश में संविधान की प्रस्तावना अपरिवर्तनीय है। इसे बदलने की बात करना संविधान निर्माताओं की सोच से विश्वासघात होगा।
आपातकाल के दौरान जोड़ना था लोकतंत्र पर आघात
धनखड़ ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा, आपातकाल लोकतंत्र का सबसे काला दौर था, जहां लोगों की आवाज दबा दी गई थी। उसी समय संविधान की प्रस्तावना में ‘तड़का’ लगाया गया। यह संविधान की आत्मा से छेड़छाड़ थी। उन्होंने जोर दिया कि बाबासाहेब आंबेडकर ने प्रस्तावना को जिस मूल स्वरूप में तैयार किया, वही संविधान की असल पहचान है।
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विपक्ष ने किया विरोध, RSS और BJP ने दी सफाई
दत्तात्रेय होसबले के बयान को लेकर कांग्रेस और INDIA गठबंधन के नेताओं ने विरोध जताया है। कांग्रेस ने इसे संविधान पर सीधा हमला बताया है। वहीं, केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह और बीजेपी नेताओं ने होसबले के बयान का समर्थन किया और कहा कि ये शब्द मूल संविधान का हिस्सा नहीं थे और उन्हें आपातकाल की परिस्थितियों में जोड़ा गया था। इस बहस को आगे बढ़ाते हुए आरएसएस से जुड़ी पत्रिका ऑर्गनाइजर में प्रकाशित लेख में कहा गया कि यह संविधान को खत्म करने की नहीं, बल्कि उसकी मूल भावना की बहाली की बात है।
