कुर्सी का वो अंदरूनी खेल जिसने कई बार उजाड़े कांग्रेस के बसे-बसाए सियासी किले, नई नहीं है CM की गद्दी की लड़ाई
Congress Internal Politics: देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी में कुर्सी की लड़ाई नई बात नहीं है। अक्सर ऐसे मौके आए जब आलाकमान के आदेश पर सिटिंग सीएम को गद्दी छोड़नी पड़ी। कई बार तो सरकार भी गिर गई।
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
कांग्रेस में पुरानी है कुर्सी की लड़ाई, फोटो- सोशल मीडिया
Congress Leadership Transitions: भारतीय राजनीति की बिसात पर सत्ता का खेल जितना बाहर से दिलचस्प दिखता है, उसके भीतर की परतें उतनी ही पेचीदा और कभी-कभी दर्दनाक भी होती हैं। पिछले 30 वर्षों का इतिहास गवाह है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी, कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती अक्सर सामने वाला प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि उसके अपने ही घर के भीतर छिपे असंतोष के स्वर रहे हैं।
कांग्रेस के इतिहास में ऐसे कई अध्याय दर्ज हैं जहां दिल्ली दरबार यानी हाईकमान की मर्जी विधानसभा के बहुमत से भी ऊपर रही है। हाल ही में कर्नाटक में मई 2026 में हुए बड़े नेतृत्व परिवर्तन ने एक बार फिर बड़ी बहस को छेड़ दी है। जब राजनीतिक गलियारों में ‘ढाई-ढाई साल’ के फार्मूले गूंजते हैं, तो असल में उस अस्थिरता की नींव रखी जा रही होती है जिसका खामियाजा अक्सर जनता को भुगतना पड़ता है। पिछले कई दशकों में अनेकों बार कांग्रेस पार्टी में कुर्सी को लेकर खींचतान सामने आई है। इसमें सत्ता को नफा और नुकसान दोनों देखने को मिला है। आइए सिलसिलेवार समझते हैं कब-कब पार्टी में कुर्सी की लड़ाई छिड़ी और इसका पार्टी पर क्या असर पड़ा।
कर्नाटक में छिड़ी कुर्सी की जंग, पीछे हटे सिद्धारमैया
सबसे ताजा और ज्वलंत उदाहरण कर्नाटक से सामने आया, जहां साल 2023 की प्रचंड जीत के बाद मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार के बीच वर्चस्व की एक लंबी जंग चली। उस वक्त दिल्ली में बैठे पार्टी के रणनीतिकारों ने एक अघोषित समझौता किया था जिसे राजनीति में रोटेशनल सीएम का नाम दिया गया। सिद्धारमैया शुरुआत में पद छोड़ने के पक्ष में बिल्कुल नहीं थे और वे बार-बार सार्वजनिक मंचों से अपनी इच्छा जताते रहे कि वे पूरे 5 साल सरकार चलाएंगे। लेकिन जैसे ही साल 2026 का मई महीना आया, पार्टी नेतृत्व का डंडा चला और सिद्धारमैया को पीछे हटना पड़ा।
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डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया, फोटो- सोशल मीडिया
सिद्धारमैया ने खुद स्वीकार किया कि उन्होंने आलाकमान के निर्देश का पालन किया है। इसके बाद ‘संकटमोचक’ कहे जाने वाले डीके शिवकुमार की ताजपोशी तो हो गई, लेकिन क्या यह बदलाव 2028 के अगले चुनाव तक पार्टी की एकता को बचा पाएगा, यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न है। एक आम पाठक के नजरिए से देखें तो यह बदलाव राज्य की प्रशासनिक मशीनरी में भी हलचल पैदा करता है, क्योंकि नई लीडरशिप के साथ अक्सर नई प्राथमिकताएं और नई टीमें आती हैं, जिससे चल रही योजनाओं की गति धीमी पड़ सकती है।
पंजाब का वो सबक जिसने पलट दी कांग्रेस की कश्ती
अगर हम कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक विफलता के उदाहरण की तलाश करें, तो पंजाब का साल 2021 का सियासी ड्रामा सबसे ऊपर आता है। कैप्टन अमरिंदर सिंह, जो पंजाब में कांग्रेस का सबसे कद्दावर चेहरा थे, उन्हें अपने ही साथी नवजोत सिंह सिद्धू की बगावत का सामना करना पड़ा। सिद्धू और उनके समर्थक मंत्रियों ने कैप्टन के खिलाफ ऐसा मोर्चा खोला कि पार्टी हाईकमान को भी उनके सामने झुकना पड़ा। सितंबर 2021 में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपमानित महसूस करते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू, फोटो- सोशल मीडिया
पार्टी ने उनकी जगह चरणजीत सिंह चन्नी को कुर्सी सौंप दी, यह सोचकर कि एक दलित चेहरा चुनावी समीकरणों को पूरी तरह बदल देगा।, लेकिन असलियत में, यह नेतृत्व परिवर्तन विनाशकारी साबित हुआ। सत्ता का केंद्र तीन हिस्सों- कैप्टन, सिद्धू और चन्नी में बंट गया। इसका सीधा असर सरकारी कामकाज पर पड़ा और जनता में यह संदेश गया कि पार्टी सत्ता के लालच में आपस में ही लड़ रही है। परिणाम यह हुआ कि 2022 के चुनाव में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस का सफाया कर दिया। यह एक ऐसा सबक है जो बताता है कि अगर नेतृत्व परिवर्तन संगठन के भीतर तालमेल नहीं बिठा पाता, तो वह पूरी पार्टी को गर्त में ले जाता है।
राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कुर्सी की जंग का अंजाम भी वही
पार्टी की दुविधा केवल मुख्यमंत्री बदलने तक ही सीमित नहीं रही है। कई बार चेहरे न बदलना भी कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित हुआ है। राजस्थान का मामला इसका सबसे बड़ा सबूत है, जहां मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच की खींचतान पांच साल तक अखबारों की सुर्खियां बनी रही। साल 2018 में सत्ता में वापसी का बड़ा श्रेय पायलट को दिया जा रहा था, लेकिन अनुभव का हवाला देते हुए कमान गहलोत को दी गई। 2020 में पायलट की बगावत और मानेसर के घटनाक्रम के बावजूद हाईकमान ने कोई ठोस फैसला नहीं लिया।
अशोक गहलोत और सचिन पायलट, फोटो- सोशल मीडिया
गहलोत अंत तक चेहरा बने रहे, लेकिन इस अंदरूनी लड़ाई ने कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ दिया। ठीक यही कहानी छत्तीसगढ़ में भी दोहराई गई, जहां भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव के बीच कथित ढाई-ढाई साल का फार्मूला कभी जमीन पर नहीं उतरा। सिंहदेव ने दिल्ली के कई चक्कर काटे, लेकिन बघेल ने विधायकों को दिल्ली ले जाकर अपनी ताकत दिखाई और कुर्सी नहीं छोड़ी। इन दोनों राज्यों में नतीजा एक जैसा ही रहा और साल 2023 के अंत में कांग्रेस के हाथ से सत्ता निकल गई।
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लीडरशिप की वो बड़ी चूक जिसने गिरा दीं चुनी हुई सरकारें
पिछले तीन दशकों का डेटा देखें तो यह साफ दिखाता है कि कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या ‘नेतृत्व परिवर्तन’ नहीं बल्कि ‘नेतृत्व प्रबंधन’ रही है। मध्य प्रदेश का उदाहरण यहां देना जरूरी है, जहां 2018 में कांग्रेस ने लंबे अंतराल के बाद सरकार बनाई थी। कमलनाथ मुख्यमंत्री बने, लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया की आकांक्षाओं और मुख्यमंत्री के बीच कोई संतुलन नहीं बन पाया। नतीजा यह हुआ कि 2020 में सिंधिया अपने समर्थकों के साथ भाजपा में चले गए और चुनी हुई सरकार धड़ाम से गिर गई। ठीक इसी तरह उत्तराखंड में भी साल 2014 में विजय बहुगुणा को हटाकर हरीश रावत को कमान सौंपी गई थी। वहां भी बगावत और राजनीतिक संकट का दौर थमा नहीं।
