कर्नाटक में ‘नवंबर क्रांति’…सिद्धारमैया क्यों जा रहे दिल्ली? कांग्रेस में कलह से सियासी पारा हाई!
Karnataka Political Revolution: कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया 20 नवंबर को बतौर सीएम 30 महीने पूरे करेंगे। इस तारीख के नजदीक आने के बाद राज्य में सियासी पारा चढ़ गया है।
- Written By: अर्पित शुक्ला
कर्नाटक में 'नवंबर क्रांति'...सिद्धरमैया क्यों जा रहे दिल्ली? कांग्रेस में कलह से सियासी पारा हाई!
Karnataka Politics: कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उनके उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच चल रही सियासी तनातनी अब अपने चरम पर पहुंचती दिखाई दे रही है। सिद्धारमैया ने बिहार चुनाव परिणामों के एक दिन बाद यानी 15 नवंबर को दिल्ली दौरे की योजना बनाई है। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि अब सिद्धारमैया क्या बड़ा कदम उठाने वाले हैं?
हालांकि आधिकारिक रूप से कहा जा रहा है कि वह इस दौरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर किसानों सहित राज्य से जुड़े मुद्दों पर बात करेंगे, लेकिन राजनीतिक हलकों में उनके दौरे को बेहद अहम सियासी कदम के रूप में देखा जा रहा है।
कर्नाटक में फिर बढ़ी सियासी गर्मी
2023 के विधानसभा चुनाव में जीत के बाद कांग्रेस ने सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री और डीके शिवकुमार को डिप्टी सीएम बनाया था। लेकिन सरकार के आधे कार्यकाल से पहले ही राज्य में नेतृत्व परिवर्तन और मंत्रिमंडल फेरबदल की चर्चा जोरों पर है। डीके शिवकुमार खुद को पार्टी का “वफादार सिपाही” बता रहे हैं, लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का गृह राज्य होने के बावजूद कर्नाटक कांग्रेस में अंदरूनी कलह और बयानबाजी थमने का नाम नहीं ले रही।
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राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें इतनी तेज हैं कि कई राजनीतिक विश्लेषक इसे संभावित सियासी तूफान की आहट बता रहे हैं। सिद्धारमैया 20 नवंबर को बतौर सीएम ढाई साल (30 महीने) पूरे करेंगे। यानी सरकार हाफ टर्म पर पहुंच चुकी है और सियासत फिर से गर्म है।
सिद्धारमैया के पास क्या विकल्प हैं?
दो दिन पहले बेंगलुरु में पत्रकारों से बातचीत में सिद्धारमैया ने कहा कि वह मंत्रिमंडल फेरबदल के लिए पार्टी आलाकमान से अनुमति लेंगे और अंतिम फैसला आलाकमान का ही होगा। ऐसा माना जा रहा है कि अगर दिल्ली दौरे के दौरान आलाकमान फेरबदल की मंजूरी देता है, तो यह संकेत होगा कि सिद्धारमैया शेष कार्यकाल के लिए सीएम बने रहेंगे।
अगर ऐसा नहीं होता है, तो सूत्रों का कहना है कि सिद्धारमैया ने विकल्प योजना तैयार कर रखी है। उनके करीबी बताते हैं कि वह अपने उत्तराधिकारी के रूप में किसी दलित या पिछड़े वर्ग के नेता का नाम सुझा सकते हैं। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि पार्टी आलाकमान उन्हें दिल्ली की राजनीति में भूमिका देने पर विचार कर रहा है, लेकिन सिद्धारमैया इसमें खास रुचि नहीं रखते क्योंकि उन्हें न अंग्रेजी आती है और न हिंदी।
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कहां अटक सकता है खेल?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि सिद्धारमैया एक अनुभवी नेता हैं और उनके दलित या पिछड़े वर्ग के सीएम प्रस्ताव को मल्लिकार्जुन खड़गे का समर्थन मिल सकता है, लेकिन इसके लिए राहुल गांधी की मंजूरी जरूरी होगी। पार्टी का एक बड़ा वर्ग डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनते देखना चाहता है, क्योंकि वह Gen Z में बेहद लोकप्रिय हैं। सिद्धारमैया समर्थकों को उम्मीद है कि अगर नेतृत्व परिवर्तन होता है, तो खड़गे और राहुल गांधी दलित या पिछड़े वर्ग के नाम पर सहमत हो जाएंगे। इसलिए सिद्धारमैया ने फिलहाल कैबिनेट फेरबदल का दांव खेलकर आलाकमान का रुख भांपने की कोशिश की है। अगर राहुल गांधी इस फेरबदल को हरी झंडी देते हैं, तो यह संकेत होगा कि सिद्धारमैया अपना कार्यकाल पूरी तरह पूरा करेंगे।
