

BRICS India 2026 Summit Challenges: दुनिया की बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियां आज क्षेत्रीय और वैश्विक संगठनों के अस्तित्व पर सवाल खड़ा कर रही हैं। एक समय था जब दक्षिण एशियाई सहयोग संगठन (SAARC) अपनी सार्थकता खो बैठा, फिर क्वाड (Quad) की गति धीमी पड़ गई और अब भारत की अध्यक्षता में हो रहे ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन पर भी संकट के बादल मंडराते नजर आ रहे हैं। क्या भारत अपनी कूटनीति से इस मंच को बिखरने से बचा पाएगा?
भारत 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है। 14-15 जून को विदेश मंत्रियों की बैठक प्रस्तावित है और इसके बाद सितंबर में राष्ट्राध्यक्षों का बड़ा सम्मेलन होना है। हालांकि, ब्रिक्स के 11 सदस्यों के बीच ईरान के मुद्दे पर बढ़ती तकरार ने इस सम्मेलन की सफलता पर ग्रहण लगा दिया है।
ईरान चाहता है कि BRICS का मंच अमेरिकी हमलों और पश्चिमी नीतियों की कड़ी निंदा करे। दूसरी ओर, भारत अपनी अध्यक्षता में यह सुनिश्चित करना चाहता है कि ब्रिक्स किसी भी तरह से 'पश्चिम-विरोधी' (Anti-West) गुट के रूप में न दिखे। इस मुद्दे पर रूस और चीन का रुख अलग है, जो भारत के लिए संतुलन बनाना मुश्किल कर रहा है। यदि सदस्य देश किसी सर्वसम्मत नतीजे पर नहीं पहुंचते हैं, तो यह न केवल विदेश मंत्रियों की बैठक को विफल करेगा, बल्कि सितंबर के शिखर सम्मेलन को भी गहरे संकट में डाल सकता है।
ब्रिक्स के भीतर एक और बड़ा विवाद पाकिस्तान की एंट्री को लेकर है। चीन एक बार फिर पाकिस्तान को ब्रिक्स में शामिल करने की पैरवी कर रहा है, जबकि भारत इसके सख्त खिलाफ है। जानकारों का मानना है कि यह स्थिति (SAARC) के दौर की याद दिलाती है, जहां पाकिस्तान की बाधा डालने वाली नीतियों के कारण पूरा संगठन निष्क्रिय हो गया था। भारत हमेशा से क्षेत्रीय सहयोग के लिए सकारात्मक प्रस्ताव लाता रहा है, लेकिन पाकिस्तान ने अक्सर अपनी संकीर्ण राजनीति के चलते उन्हें बाधित किया है। नतीजा यह है कि आज दक्षेस अपनी उपयोगिता लगभग खो चुका है। अब वही पैटर्न ब्रिक्स में दोहराने की कोशिश हो रही है, जो भारत के लिए किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है।
केवल ब्रिक्स ही नहीं, बल्कि 'क्वाड' का भविष्य भी अधर में लटका रहा। भारत की अध्यक्षता में 2025 में क्वाड शिखर सम्मेलन होना था, लेकिन नहीं हो सका। अब आगे भी होने के आसार न के बराबर हैं। सूत्रों की मानें तो व्यापार शुल्क और अन्य नीतिगत मुद्दों पर अमेरिका के साथ चल रहे तनाव के कारण भारत अब क्वाड को लेकर उतना उत्साहित नहीं है।
वास्तव में देखा जाए तो, भारत का मानना है कि क्वाड से जितना लाभ अमेरिका को मिल रहा है, उतना भारत को नहीं। क्वाड के जरिए अमेरिका इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है और चीन को घेरना चाहता है। भारत ने अमेरिका को स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की है, लेकिन वहां से कोई प्रतिक्रिया न मिलने के कारण यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया है।
भारत के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। एक तरफ अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना और दूसरी तरफ इन अंतरराष्ट्रीय मंचों को प्रासंगिक बनाए रखना। ब्रिक्स 2026 की सफलता पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत, रूस, चीन और अन्य सदस्य देश आपसी मतभेदों को दरकिनार कर आम सहमति बना पाते हैं या नहीं। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो आने वाले समय में विश्व मंच पर इन संगठनों का महत्व और भी कम हो सकता है।