जयंती विशेष: वह महान हस्ती जिसने मुफ्त में लड़े क्रांतिकारियों के केस, गांधी के साथ 'असहयोग' में किया सहयोग

05 नवंबर को एक ऐसी हस्ती की जयंती है जो पेशे से वकील था और क्रांतिकारियों के केस मुफ्त में लड़ता था। जिसने असहयोग आंदोलन में गांधी के साथ कदमताल की।
जयंती विशेष: वह महान हस्ती जिसने मुफ्त में लड़े क्रांतिकारियों के केस, गांधी के साथ 'असहयोग' में किया सहयोग
देशबंधु चितरंजन दास (सोर्स-सोशल मीडिया)
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नवभारत डेस्क: आज यानी मंगलवार 05 नवंबर को एक ऐसी हस्ती की जयंती है जो पेशे से वकील था और क्रांतिकारियों के केस मुफ्त में लड़ता था। जिसने असहयोग आंदोलन में गांधी के साथ कदमताल की। जिसने कई क्रांतिकारी मुखपत्रों और पत्रिकाओं में संपादक की भूमिका निभाई और जिसे देशबंधु के नाम से जाना जाता है।

जी हां, आज देशबंधु चितरंजन दास की 154वीं जयंती है। सीआर दास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिक कार्यकर्ता और वकील थे। 5 नवंबर, 1870 को जन्मे चित्तरंजन दास ने 1890 में कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। वे भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान बंगाल में स्वराज पार्टी के संस्थापक नेता भी थे। उनके पिता भुवन मोहन दास कलकत्ता उच्च न्यायालय में वकील थे।

कलकत्ता हाईकोर्ट में की वकालत

1890 में दास अपनी आईसीएस की पढ़ाई पूरी करने के लिए इंग्लैंड गए, लेकिन परीक्षा पास नहीं कर सके। इसके बाद उन्होंने कानूनी पेशे में शामिल होने का विकल्प चुना और लंदन में द ऑनरेबल सोसाइटी ऑफ़ द इनर टेम्पल में वकालत की। इंग्लैंड में अपने कार्यकाल के दौरान दास ने सेंट्रल फ़िन्सबरी से हाउस ऑफ़ कॉमन्स में सीट जीतने के लिए दादाभाई नौरोजी के लिए अभियान चलाया। नौरोजी 1892 में वेस्टमिंस्टर का हिस्सा बनने वाले पहले एशियाई थे। वे दो साल बाद भारत लौट आए और कलकत्ता उच्च न्यायालय में बैरिस्टर के रूप में वकालत की।

इस तरह चर्चा में आओ सीआर दास

अपने कानूनी करियर के दौरान, उन्होंने अलीपुर बम मामले में अरबिंदो घोष का सफलतापूर्वक बचाव करने के बाद प्रसिद्धि प्राप्त की। घोष इस मामले में मुख्य आरोपी थे। दास ने घोष को बरी करवाया था। बाद में दास छह साल की छोटी अवधि के लिए राजनीति में शामिल हो गए। दास महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए और 1921 में अहमदाबाद कांग्रेस के लिए चुने गए। गांधी ने बार-बार दास के प्रति अपना स्नेह व्यक्त किया और स्वतंत्रता आंदोलन के लिए उनके प्रयासों की सराहना की।

पत्रकारिता में भी किया बेमिसाल काम

चितरंजन दास एक कुशल पत्रकार के रूप में भी जाने जाते थे। उन्होंने वैष्णव साहित्य-उन्मुख पत्रिका 'नारायण' का संपादन भी किया और अंग्रेजी समाचार पत्र 'वंदे मातरम' के प्रमुख सदस्य थे। उन्होंने 'स्वराज्य दल' के मुखपत्र 'फॉरवर्ड' का भी कार्यभार संभाला। गांधी के नेतृत्व में 'असहयोग आंदोलन' में देशबंधु और उनकी पत्नी को गिरफ्तार किया गया, जिसमें उन्हें छह महीने की सजा सुनाई गई। 1921 में जब देशबंधु जेल में थे, तब अहमदाबाद अधिवेशन में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया।

1922 में जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने बाहर से आंदोलन करने के बजाय परिषदों के भीतर ही राष्ट्रविरोधी नीतियों के खिलाफ काम करने की नीति की वकालत की, जिसका प्रस्ताव पारित नहीं हुआ। जब कांग्रेस ने उनके 'परिषद प्रवेश' प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, तो उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस के भीतर ही 'स्वराज पार्टी' की स्थापना की। दास इसके अध्यक्ष और मोतीलाल नेहरू सचिव थे। पार्टी शांति और कानून के माध्यम से स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध और समर्पित थी।

राष्ट्र के नाम दान कर दी सारी संपत्ति

1925 में उनका स्वास्थ्य खराब हो गया और वे दार्जिलिंग चले गए लेकिन उनका स्वास्थ्य बिगड़ता चला गया। 16 जून 1925 को तेज बुखार के कारण उन्होंने अंतिम सांस ली। देशबंधु चित्तरंजन दास ने अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले महिलाओं के विकास के लिए अपना घर और अन्य संपत्ति राष्ट्र को दान कर दी थी।

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