प्रतीकात्मक फोटो, सोर्स- सोशल मीडिया
Gir Somnath Court Una Case: गुजरात के चर्चित ऊना दलित पिटाई कांड में एक दशक बाद कोर्ट का फैसला आ गया है। गिर सोमनाथ सेशन कोर्ट ने 5 मुख्य आरोपियों को 5-5 साल की सजा सुनाई है, जबकि पुलिसकर्मियों सहित 35 अन्य आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया है।
भारत में सामाजिक न्याय और जातिगत उत्पीड़न की बहस को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने वाले ‘ऊना कांड’ का कानूनी पड़ाव आखिरकार सामने आ गया है। 11 जुलाई 2016 को हुई उस दर्दनाक घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद महीनों तक प्रदर्शन हुए थे। अब 10 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, कोर्ट ने अपना अंतिम फैसला सुनाया है।
कोर्ट ने सोमवार को 5 आरोपियों को दोषी करार दिया था और मंगलवार को उनकी सजा का ऐलान किया। दोषियों- रमेश जादव, राकेश जोशी, नागजीभाई वणिया, प्रमोदगिरि गोस्वामी और बलवंतगिरि गोस्वामी। इन पांचों को 5-5 साल की जेल की सजा सुनाई गई है। इन्हें IPC की धारा 323 (मारपीट), 324 (हथियार से हमला), 504 (अपमान) और 506(2) (धमकी) के साथ-साथ SC/ST एक्ट की गंभीर धाराओं के तहत दोषी माना गया है।
इस मामले में सबसे ज्यादा चर्चा उन 35 आरोपियों की रिहाई की है, जिन्हें कोर्ट ने ‘पर्याप्त सबूत न होने’ के कारण बरी कर दिया। कोर्ट ने तत्कालीन पुलिस इंस्पेक्टर निर्मल सिंह झाला (जिनकी मौत हो चुकी है), कंचनबेन, PSI पांडे और ऊना PSO करशनभाई को बरी कर दिया है। शुरुआती 42 आरोपियों में से 2 की सुनवाई के दौरान मौत हो गई थी। कोर्ट ने हत्या के प्रयास, डकैती और आपराधिक साजिश जैसे बड़े आरोपों में किसी को भी दोषी नहीं पाया।
यह घटना गुजरात में ऊना तालुका के मोटा समधियाला गांव की है। 11 जुलाई 2016 को तथाकथित ‘गौरक्षकों’ ने एक दलित परिवार के चार युवकों को मरी हुई गाय की खाल उतारने के आरोप में घेर लिया था। पीड़ितों का कहना था कि यह उनका पुश्तैनी काम है, लेकिन गौरक्षकों ने उन्हें अधनंगा कर कार से बांधा और सरेआम लाठियों और बेल्टों से पीटा था।
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मामले के मुख्य शिकायतकर्ता और पीड़ित वशराम सरवैया ने इस फैसले पर गहरा दुख जताया है। उन्होंने कहा कि 10 साल के इंतजार के बाद इतने सारे आरोपियों का बरी होना ‘दुखद’ है। वशराम ने ऐलान किया है कि वे इस फैसले को चुनौती देने के लिए हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे।