The Family Man 3 Review: दमदार एक्टिंग पर हावी कमजोर स्क्रिप्ट, मेकर के ओवर कॉन्फिडेंस से बिगड़ा खेल
The Family Man 3 Review: मनोज बाजपेयी और जयदीप अहलावत की दमदार एक्टिंग है प्लस पॉइंट, लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट और निर्देशन में असंगतता से थ्रिल हुआ खत्म।
- Written By: अनिल सिंह
TFM3 रिव्यू: चार साल का इंतज़ार हुआ बेकार? 'द फैमिली मैन 3' में जयदीप अहलावत की एंट्री दमदार, लेकिन पटकथा ने किया निराश
The Family Man 3: बहुप्रतीक्षित जासूसी थ्रिलर वेब सीरीज़ ‘द फैमिली मैन सीज़न 3’ (TFM3) आखिरकार रिलीज़ हो गई है, लेकिन चार साल का लंबा इंतज़ार फैंस के लिए निराशाजनक साबित हुआ है। थ्रेट एनालिसिस एंड सर्विलांस सेल (TASC) के वरिष्ठ अधिकारी श्रीकांत तिवारी (मनोज बाजपेयी) की कहानी इस बार कमजोर पटकथा और अनुमान लगाने योग्य कथानक के कारण अपनी पुरानी धार खोती नजर आ रही है। रिव्यू बताते हैं कि मेकर्स, राज और डीके, के ओवर कॉन्फिडेंस ने इस सीज़न का खेल बिगाड़ दिया है।
सीज़न की शुरुआत नागालैंड के कोहिमा में हुए एक बम विस्फोट से होती है, जिसके बाद श्रीकांत को अपने गुरु कुलकर्णी (दलीप ताहिल) और दोस्त जेके (शारिब हाशमी) के साथ ‘प्रोजेक्ट सहकार’ को सफल बनाने के लिए पूर्वोत्तर (Seven Sisters) की यात्रा करनी पड़ती है। इस सीज़न का मास्टरमाइंड मीरा (निमरत कौर) है, जो एक निर्दयी ‘बिज़नेसवुमन’ है, जिसके खतरनाक एजेंडे के कारण श्रीकांत की निजी और पेशेवर ज़िंदगी खतरे में पड़ जाती है। इस बार खलनायक के रूप में रुक्मा (जयदीप अहलावत) भी नज़र आए हैं।
क्या है दमदार: अभिनय और ब्रोमांस
‘द फैमिली मैन 3’ को अगर कोई चीज बचाती है, तो वह है मनोज बाजपेयी और बाकी कलाकारों का अभिनय।
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मनोज बाजपेयी: उन्होंने हमेशा की तरह श्रीकांत को प्यार और दिल से जीवंत कर दिया है। देशद्रोही करार दिए जाने के बाद उनका डर और सहज, व्यंग्यात्मक वन-लाइनर्स दर्शकों को हँसाते हैं।
जयदीप अहलावत: रुक्मा के रूप में जयदीप अहलावत ख़तरनाक हैं। उनका संयमित और सोचे-समझा अभिनय श्रीकांत की अराजक ऊर्जा के लिए एकदम सही प्रतिनायक है और उनका आर्क सराहनीय है।
श्रीकांत-जेके ब्रोमांस: श्रीकांत और जेके (शारिब हाशमी) के बीच की नोकझोंक इस जासूसी थ्रिलर का सबसे बेहतरीन हिस्सा है। उनका ब्रोमांस हमेशा की तरह भावनात्मक सहारा प्रदान करता है।
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क्या है कमजोर: कमजोर पटकथा और डायरेक्शन
इस सीज़न की सबसे बड़ी विफलता इसकी पटकथा है। कहानी थोड़ी खींची हुई है—सिर्फ़ 7 एपिसोड होने के बावजूद।
पटकथा और थ्रिल: पटकथा अधूरी और अनुमान लगाने लायक है, जिसके कारण इस जासूसी थ्रिलर ने अपना सारा रोमांच खो दिया है। पहले के सीज़न में मिलने वाले गहन और लंबे टकराव वाले दृश्यों का अभाव है।
निर्देशन में असंगतता: राज और डीके के साथ सुमन कुमार और तुषार सेठ भी निर्देशन में शामिल हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि यह कई रसोइयों के मिलकर सूप खराब करने का नतीजा साबित हुई है। निर्देशकों की प्रतिभा कुछ दृश्यों में ही दिखाई देती है, जो निराशाजनक है।
कमजोर खलनायक: निमरत कौर की मीरा की शुरुआत तो दमदार होती है, लेकिन लेखन के दोष के कारण वह अपना प्रभाव छोड़ने में विफल रहती हैं और उनका किरदार उथला लगता है।
चार साल के इंतज़ार लायक नहीं
द फैमिली मैन सीज़न 3 चार साल के इंतज़ार के लायक नहीं है। जहाँ सीज़न 1 और 2 क्रमशः 10 और 8 एपिसोड के थे, वहीं इस सीज़न के 7 एपिसोड एक जल्दबाज़ी में, पहले से तय, अधूरी और असंतोषजनक कहानी पेश करते हैं। हालाँकि शानदार अभिनय आपको बांधे रखता है, लेकिन कमज़ोर पटकथा इसे एक ‘मस्ट वॉच’ सीरीज़ नहीं बनाती। यह शो केवल इसलिए देखा जा सकता है ताकि पता चल सके कि श्रीकांत तिवारी और उनका परिवार देशद्रोही करार दिए जाने से कैसे उबरेंगे।
