सिद्धांत चतुर्वेदी का बॉलीवुड पर प्रहार: “सिर्फ जुहू-बांद्रा की कहानियों तक सीमित रह गई है हमारी इंडस्ट्री”
Siddhant Chaturvedi On Bollywood: सिद्धांत चतुर्वेदी ने बॉलीवुड में छोटे शहरों के लेखकों के संघर्ष और भाषाई भेदभाव पर खुलकर बात की। उन्होंने 'लापता लेडीज' जैसी कहानियों का समर्थन किया।
- Written By: अनिल सिंह
Siddhant Chaturvedi (फोटो क्रेडिट-इंस्टाग्राम)
Siddhant Chaturvedi On Bollywood Writers: अभिनेता सिद्धांत चतुर्वेदी आज मनोरंजन जगत का एक जाना-माना नाम हैं। अपनी मेहनत और लगन से ‘गली बॉय’ के एमसी शेर बनकर उभरे सिद्धांत ने हाल ही में एक पॉडकास्ट के दौरान फिल्म इंडस्ट्री के कई कड़वे सच उजागर किए। उन्होंने विशेष रूप से छोटे शहरों से आने वाले लेखकों के संघर्ष और हिंदी सिनेमा के सिमटते हुए दायरे पर अपनी चिंता व्यक्त की।
सिद्धांत का मानना है कि आज भी बॉलीवुड का दिल मुंबई के जुहू, बांद्रा और अंधेरी जैसे पॉश इलाकों तक ही सीमित है। उनके अनुसार, देश के कस्बों और गांवों में प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन इंडस्ट्री की जटिल व्यवस्था उन तक पहुँचने का रास्ता नहीं देती। उन्होंने कहा, “हिंदी सिनेमा को अगर वाकई आम जनता से जुड़ना है, तो उसे इस पुराने दायरे से बाहर निकलना ही होगा।”
बांद्रा-अंधेरी तक सीमित है इंडस्ट्री, छोटे शहर के लेखकों को नहीं मिलता मौका
सिद्धांत ने इस बात पर जोर दिया कि इंडस्ट्री में आज भी असली भारतीय कहानियों की कमी है। उन्होंने हालिया फिल्म ‘लापता लेडीज’ का उदाहरण देते हुए कहा कि दर्शकों को ऐसी हार्टलैंड (मिट्टी से जुड़ी) कहानियों की तलाश है। लेकिन विडंबना यह है कि इन कहानियों को लिखने वाले छोटे शहरों के लेखकों को मौका नहीं मिलता। सिद्धांत ने लेखकों के कम मेहनताने के मुद्दे पर भी आवाज उठाई और कहा कि जो लोग फिल्म की नींव रखते हैं, उन्हें वह सम्मान और पैसा नहीं मिल रहा जिसके वे हकदार हैं।
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अंग्रेजी न बोल पाना बन रही है सबसे बड़ी रुकावट
खुद उत्तर प्रदेश के बलिया से ताल्लुक रखने वाले सिद्धांत ने एक गंभीर मुद्दे की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि भोपाल, ग्वालियर या बनारस से आए एक काबिल लेखक को मुंबई में सिर्फ इसलिए जगह नहीं मिलती क्योंकि वह धाराप्रवाह अंग्रेजी नहीं बोल पाता। भाषाई अवरोध और सांस्कृतिक दूरी के कारण मेनस्ट्रीम सिनेमा और असली भारत के दर्शकों के बीच एक खाई पैदा हो गई है। उनके अनुसार, सिनेमा की भाषा दिल की होनी चाहिए, न कि किसी खास विदेशी भाषा की दक्षता पर आधारित।
‘जेन जी’ (Gen Z) की समझदारी और सिनेमा का भविष्य
सिद्धांत ने बातचीत के अंत में आज की युवा पीढ़ी यानी ‘जेन जी’ की जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि आजकल के युवा दर्शक काफी समझदार हैं। वे तुरंत भांप लेते हैं कि कौन सी कहानी दिल से लिखी गई है और कौन सी महज एक बिजनेस फॉर्मूले के तहत तैयार की गई है। सिद्धांत ने कहा कि बिना किसी गॉडफादर के इंडस्ट्री में कदम रखने वाले लेखकों और कलाकारों को ‘जेन जी’ का पूरा समर्थन मिल रहा है, जो भविष्य के लिए एक सकारात्मक संकेत है।
