ओंकार प्रसाद नय्यर (फोटो क्रेडिट-इंस्टाग्राम)
Omkar Prasad Nayyar Birth Anniversary: हिंदी फिल्म संगीत के स्वर्णिम इतिहास में ओ पी नय्यर का नाम ऐसे संगीतकारों में शुमार है, जिन्होंने अपने अलग अंदाज और अनोखी लय से एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया। उन्हें यूं ही ‘रिदम किंग’ नहीं कहा गया। उनके गानों में ताल इतनी मजबूत होती थी कि श्रोता अनायास ही थिरकने लगता था। ‘बाबूजी धीरे चलना’, ‘कभी आर कभी पार’, ‘आओ हुजूर तुमको’, ‘मेरा नाम चिन चिन चू’ और ‘चल अकेला’ जैसे गीत आज भी उतने ही चलते हैं, जितने अपने दौर में थे।
ओंकार प्रसाद नय्यर का जन्म 16 जनवरी 1926 को अविभाजित भारत के लाहौर में हुआ था। बचपन से ही संगीत में उनकी गहरी रुचि थी, लेकिन परिवार चाहता था कि वे पढ़ाई और सुरक्षित करियर की राह चुनें। इसके बावजूद नय्यर का मन सुर और ताल में ही रमा रहा। कहा जाता है कि वे फिल्मों में पहले अभिनेता बनने का सपना लेकर आए थे, लेकिन बार-बार रिजेक्शन मिलने के बाद उन्होंने संगीत को अपना रास्ता बनाया। यही फैसला उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
साल 1952 में फिल्म ‘आसमान’ से उन्हें संगीतकार के रूप में पहला मौका मिला। असली पहचान उन्हें गुरुदत्त की फिल्मों से मिली। ‘सीआईडी’, ‘आर-पार’, ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’ और ‘तुमसा नहीं देखा’ जैसी फिल्मों के गानों ने उन्हें घर-घर पहुंचा दिया। ओ. पी. नय्यर की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे अपने संगीत में सितार का इस्तेमाल नहीं करते थे। इसके बावजूद उनकी धुनें बेहद मधुर और असरदार होती थीं। पंजाबी लोक संगीत, वेस्टर्न बीट्स और देसी रंग का अनोखा मेल उनके संगीत की पहचान बना।
ओ पी नय्यर का नाम आते ही आशा भोसले का जिक्र भी अपने आप हो जाता है। दोनों की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को कई सदाबहार गीत दिए। हालांकि, निजी मतभेदों के चलते दोनों का रिश्ता टूट गया, जिसका असर नय्यर के करियर पर भी पड़ा। इसके बाद उनका करियर धीरे-धीरे ढलान पर चला गया, लेकिन उनके संगीत की चमक कभी फीकी नहीं पड़ी।
जिंदगी के आखिरी दौर में आर्थिक और निजी परेशानियों के बावजूद ओ पी नय्यर अपने फैसलों पर अडिग रहे। वे स्वाभिमानी कलाकार थे और उसी शान से जिए। आज भी जब उनके गाने बजते हैं, तो यह एहसास होता है कि ओ पी नय्यर सिर्फ एक संगीतकार नहीं थे, बल्कि हिंदी फिल्म संगीत की धड़कन थे, जो हमेशा जिंदा रहेगी।