

Pankaj Tripathi Film Oh My Dog Review: पंकज त्रिपाठी स्टारर और निर्देशक अमित राय की नई फिल्म 'ओह माय डॉग' इंसानों और उनके पालतू जानवरों (डॉग्स) के बीच के निस्वार्थ प्रेम को दर्शाती है। यह एक साफ-सुथरी पारिवारिक फिल्म है जिसे आप बच्चों के साथ आसानी से देख सकते हैं। हालांकि, अपनी मासूमियत के बावजूद यह फिल्म कई मायनों में दर्शकों पर कोई गहरी छाप छोड़ने में नाकाम रहती है। नवभारत ने इस फिल्म को 2.5 स्टार्स (2.5/5) दिए हैं।
फिल्म की कहानी दो प्यारे पिल्लों (पप्स), मोमो और ऑस्कर के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जो जन्म के तुरंत बाद एक-दूसरे से बिछड़ जाते हैं। मोमो को असम के एक अच्छे परिवार में पनाह मिलती है, जबकि ऑस्कर को एक कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करने वाला मजदूर, प्रिंस गोद ले लेता है। कहानी में असली मोड़ तब आता है जब एक दिन मोमो और प्रिंस दोनों रहस्यमयी तरीके से गायब हो जाते हैं।
इसके बाद दोनों की तलाश शुरू होती है और इसी पर फिल्म का फर्स्ट हाफ टिका है जो काफी हद तक दिलचस्प लगता है। लेकिन इसके बाद फिल्म की कहानी काफी प्रेडिक्टेबल हो जाती है। चीजों को सरल रखने के चक्कर में निर्देशक ने लॉजिक को काफी पीछे छोड़ दिया है। एक छोटे बच्चे का पूरी पुलिस फोर्स को आसानी से चकमा दे देना या पूरी पुलिस का एक कुत्ते से खौफ खाना ये सब एक-दो बार मजेदार लगता है, लेकिन बार-बार दिखाने पर यह दर्शकों को हजम नहीं होता।
फिल्म की असली जान और सबसे बेहतरीन कलाकार इसके डॉगी हैं, जो हर सीन में आपका दिल जीत लेते हैं। इंसानी कलाकारों की बात करें तो बाल कलाकार मोहित राय ने अपने प्यारे मोमो को खोजने के लिए दृढ़ संकल्पित बच्चे के रूप में आत्मविश्वास से भरा प्रदर्शन किया है। पंकज त्रिपाठी फिल्म में एक स्पेशल अपीयरेंस में नजर आए हैं, लेकिन उनके किरदार के पास करने के लिए कुछ खास नहीं था, जो उनके प्रशंसकों को निराश कर सकता है। अभिनेत्री गीता अग्रवाल पर्दे पर शानदार लगी हैं और हर सीन में अपनी सहजता से दिल जीतती हैं।
कुल मिलाकर, 'ओह माय डॉग' एक मासूम और दिल को छू लेने वाली फिल्म बनने की कोशिश करती है। फिल्म की सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें कोई फूहड़ कॉमेडी या द्विअर्थी संवाद नहीं हैं, जिससे यह एक परफेक्ट फैमिली वॉच बनती है। अमन पंत का शानदार संगीत इसके कई दृश्यों में जान फूंकने का काम करता है। हालांकि, फिल्म का कमजोर सस्पेंस और हद से ज्यादा खींचे गए इमोशनल सीन्स इसे एक औसत फिल्म बना देते हैं। कहानी में जब भी कुछ नया करने का मौका आता है, फिल्म वही घिसे-पिटे रास्ते पर चलने लगती है।