K L Saigal Birth Anniversary: बिना शराब पिए नहीं गाते थे हिंदी सिनेमा के पहले प्लेबैक सिंगर कुंदन लाल सहगल
कुंदन लाल सहगल की कई गाने आज भी अमर है, जिसमें 'जब दिल ही टूट गया', 'बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए', और 'दीवाना क्या जाने' शामिल हैं। सहगल की आवाज में एक दर्द छुपा हुआ था, जो सीधे लोगों के दिल में उतरता था।
- Written By: सोनाली झा
कुंदन लाल सहगल (फोटो सोर्स- सोशल मीडिया)
मुंबई: हिंदी सिनेमा के पहले प्लेबैक सिंगर और सुरों के अनमोल सितारे कुंदन लाल सहगल का जन्म 11 अप्रैल 1904 को जम्मू के नवांशहर में हुआ था। उनके पिता अमर चंद सहगल, जम्मू और कश्मीर के राजा के दरबार में तहसीलदार थे और माता केसरबाई सहगल धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं, जिन्हें संगीत से गहरा लगाव था। यही लगाव बचपन से ही सहगल के सुरों की नींव बन गया।
सहगल ने अपने करियर में 36 फिल्मों में अभिनय किया, जिनमें 28 हिंदी, 7 बंगाली, और 1 तमिल फिल्म शामिल हैं। उन्होंने लगभग 185 गीत गाए, जिनमें से कई आज भी अमर हैं, जैसे ‘जब दिल ही टूट गया’, ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए’, और ‘दीवाना क्या जाने’। उनकी आवाज में एक दर्द था, जो सीधे दिल में उतरता था। उनकी गायन शैली ने भारतीय संगीत उद्योग में एक नई लहर पैदा की और किशोर कुमार, मुकेश, जैसे दिग्गजों के लिए प्रेरणा बनी।
सहगल अपनी शराब की लत के लिए भी जाने जाते थे। कहा जाता है कि वे बिना शराब पिए गाना नहीं गाते थे। एक बार फिल्म शाहजहां के लिए संगीतकार नौशाद ने उन्हें बिना पिए गाने को कहा। सहगल ने वह गाना गा भी दिया और जब उन्होंने उसे दोबारा शराब पीकर गाया, तो सबको हैरानी हुई कि बिना शराब वाला संस्करण ज्यादा असरदार था। यह उनके टैलेंट का एक और उदाहरण था, जो लत के बावजूद भी बेजोड़ बना रहा।
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सहगल जितने बड़े गायक थे, उतने ही दरियादिल इंसान भी थे। उन्होंने ज़रूरतमंदों की मदद करने में कभी पीछे नहीं हटे। उनकी दरियादिली इतनी मशहूर थी कि उनकी तनख्वाह सीधे घर भेजी जाती थी, ताकि वे सब कुछ बांट न दें। एक बार दादर सर्कल पर एक भिखारी को देखकर उन्होंने अपने सारे कपड़े उसे दे दिए और खुद ठंड में अपने ड्राइवर का इंतजार करते रहे। ये किस्सा उनकी संवेदनशीलता और इंसानियत की मिसाल बन गया।
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18 जनवरी 1947, महज 42 वर्ष की उम्र में के. एल. सहगल इस दुनिया को अलविदा कह गए। उनकी याद में 1995 में भारतीय डाक विभाग ने एक डाक टिकट जारी किया, और 2018 में गूगल ने उन्हें डूडल से श्रद्धांजलि दी। आज जब पुराने गाने बजते हैं, और सहगल की आवाज़ कानों में पड़ती है। तब ऐसा लगता है जैसे समय थम गया हो। वो सिर्फ गायक नहीं थे, वो सुरों के साधक थे, संगीत की आत्मा थे।
