

Diljit Dosanjh Satluj Movie Ban: 3 जुलाई 2026 को ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 पर पंजाबी सिंगर और एक्टर दिलजीत दोसांझ की मोस्ट अवेटेड फिल्म ‘पंजाब 95’ का नाम बदलकर ‘सतलुज’ नाम से रिलीज किया गया। फिल्म पंजाब के प्रसिद्ध ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट जसवंत सिंह खालरा की असली कहानी को दिखाती है, लेकिन जैसे ही फिल्म जी5 पर रिलीज हुई केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने इस पर आपत्ति जताई। जिसके बाद फिल्म की स्ट्रीमिंग को भारत में रोक दिया गया।
सतलुज को दिलजीत दोसांझ के करियर की सबसे विवादत फिल्म माना जा रहा है। फिल्म के मेकर्स इस फिल्म को सीनेमाघरों रिलीज करना चाहते थे, लेकिन जब आज से तीन साल पहले मेकर्स ने फिल्म को CBFC के पास सर्टिफिकेशन के लिए भेजा तो बोर्ड ने न सिर्फ फिल्म का नाम बदले के लिए कहा साथ ही इसमें 127 बदलाव करने का सुझाव दिया। बोर्ड ने साफ कर दिया जब तक मेकर्स ये बदलाव नहीं करते हैं वो फिल्म को सर्टिफिकेट नहीं देगा, मतलब फिल्म को रिलीज नहीं होंगी।
इसलिए जब फिल्म ओटीटी पर रिलीज हुई है, CBFC ने इसे भारत में बैन ही कर दिया है। ऐसे में सवाल आता है कि दिलजीत दोसांझ की इस फिल्म में ऐसा क्या है कि CBFC ने इसमें 127 कट करने के लिए कहा? सरकार इस फिल्म से इतना डरी हुई क्यों है? अब जब फिल्म को भारत में बैन कर दिया गया है, तो आप इसे कैसे और कहां देख सकते हैं?
जसवंत सिंह खालरा का जन्म 2 नवंबर 1952 को पंजाब के तरन तारन जिले खालड़ा गांव में हुआ था। वो अमृतसर के एक बैंक में निदेशक के पद पर कार्यरत थे। यह 90 का दशक था जब उनके बैंक में लोग घर बनाने, बिजनेस शुरू करने या विदेश जाकर पढ़ाई के लिए नहीं बल्कि इस चीज के लिए लोन लेने के लिए आते थे कि वो खालिस्तानी आतंकवादियों के कब्जे में फंसे अपने परिजनों के पुलिस के जरिए पैसे पहुंचाकर छुड़वा सके।
यह वो समय था जब खालिस्तानी आतंकियों ने पूरे पंजाब में आतंक मचा रखा था और पुलिस इन्हें खत्म करने के लिए लड़ाई लड़ रही थी। जिनका नेतृत्व पंजाब पुलिस बल के महानिदेशक कंवर पाल सिंह गिल (DGP KPS GILL) कर रहे थे। गिल के ही नेतृतव में पंजाब पुलिस ने 1984 और 1988 में ऑपरेशन चलाकर खालिस्तानी आतंकियों के खिलाफ जंग छेड़ रखी थी।
एक तरफ जहां पुलिस आतंकवादियों को खत्म करने के लिए अलग-अलग अभियान चला रही थी। वहीं दूसरी तरफ कुछ पुलिस वाले इस माहौल का फायदा उठाकर अपनी तरक्की और पैसा कमाने के लिए मासूम और बेगुनाह लोगों का फर्जी एनकाउंटर करने के बाद उन्हें लावारिस घोषित करके उनका अंतिम संस्कार करवा दे रहे थे। यहां तक जब श्मशानों में लाशें जलाने के लिए लकड़ियां कम पड़ने लगी, तो पुलिस लाशों को पंजाब की अलग-अलग नदियों में फेंकने लगे।
पंजाब पुलिस ने ऐसे ही एक फर्जी एनकाउंटर में जसवंत सिंह खालरा के एक रिश्तेदार को मारकर उनका अंतिम संस्कार कर दिया था। जसवंत सिंह अपने उसी रिश्तेदार को खोजते हुए एक से दूसरे पुलिस थानों की चक्कर काटते रहे। लेकिन जब कहीं से कुछ नहीं पता चला तो वह अपने किसी जानने वाले के कहने पर तरन तारन के श्मशान पहुंचे और वहां के रजिस्टर में अपने रिश्तेदार का नाम ढूंढने लगे। इस दौरान उन्होंने देखा कि रजिस्टर में कई लोगों के नाम ऐसे थे जिनके नाम के आगे उनका पूरा पता, परिजनों के नाम सब कुछ लिखा था, लेकिन इसके बाद भी उन्हें लावारिस बताकर उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया था।
इसके बाद जसवंत सिंह खालरा ने एक बड़ा फैसला किया और उन्होंने अमृतसर के आसपास के और श्मशान घाटों में जाकर उन लोगों का जानकारी जुटाना शुरू किया। जिन्हें लावारिस बताकर उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया था। उन्होंने अमृतसर, मजीठा और तरनतारन के तीन श्मशान घाटों में जून 1984 से दिसंबर 1994 के बीच जलाई गई लाशों की जानकारी जुटाई, यह संख्या लगभग 2,000 से अधिक थी। जसवंत सिंह खालरा ने अपनी रिपोर्ट के आधार पर दावा किया कि पूरे पंजाब में पुलिस ने कम से कम 25 से 30 हजार लोगों का फर्जी एनकाउंटर किया है और उनकी लाशों को लावारिस बताकर जला दिया है।
जसवंत सिंह खालरा ने जैसे ही अपनी यह रिपोर्ट पेश की पंजाब समेत पूरे देश में हड़कंप मच गया और लोगों के निशाने पर थी पंजाब पुलिस और उनके लीडर केपीएस गिल। हालांकि गिल ने जसवंत सिंह खालरा की रिपोर्ट को फर्जी और निराधार बताकर खारिज कर दिया। उन्होंने पुलिस फोर्स का बचाव करते हुए कहा था कि उनके सिपाही आतंकवादी और मासूम लोगों में पहचान करना जानते हैं। ऐसे में जसवंत सिंह खालरा ने केपीएस गिल को बहस की खुली चुनौती दी थी। हालांकि, पुलिस ने इसके बाद जसवंत सिंह खालरा पर नजर रखनी शुरू कर दिया और कई बार उन्हें मामले के दूर रहने के लिए धमकी दी।
पुलिस की ओर से धमकी मिलने के बाद भी जसवंत सिंह खालरा अपना काम करते रहे। इस दौरान वो वर्ल्ड सिख ऑर्गेनाइजेशन के बुलावे पर कनाडा भी गए। यहां उन्होंने न सिर्फ अपनी बात सिख समुदाय के सामने रखी… बल्कि तत्कालीन कनाडा सरकार के बुलावे पर वहां की संसद में जाकर पंजाब में हो रहे कत्लेआम की सच्चाई बताई। उनकी बात सुनकर कनाडा सरकार ने उन्हें असाइलम (शरण) देने की पेशकश की, जिसे जसवंत सिंह खालरा ने ठुकरा दिया। कनाडा की सरकार को डर था कि अगर… जसवंत सिंह खालरा वापस पंजाब जाते हैं तो उनकी जान को भी खतरा हो सकता है। कनाडा सरकार का ये डर जल्द ही सच भी हो गया।
31 अगस्त 1995 को एक आतंकी हमले में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की मौत हो गई। इसे पुलिस और केपीएस गिल की नाकामी माना गया। जसवंत सिंह खालरा ने भी हमले की आलोचना की और पुलिस के एक्शन को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। इससे पुलिस के ऑफसर जो उनसे पहले से ही नाराज चल रहे थे वो गुस्से से आग बबुला हो गए। इसके बाद पुलिस ने 6 सितंबर 1995 को जसवंत सिंह खालरा को उनके घर के सामने से अगवा कर लिया। पुलिस इस दौरान सादे कपड़ों में थी, ताकि कोई भी उन्हें पहचान न सके।
जसवंत सिंह खालरा को अगवा करने के बाद पुलिस ने उन्हें कई दिनों तक टॉर्चर किया और अंत में उनकी हत्या करके उनकी लाश को सतलुज नदी में फेंक दिया। जसवंत सिंह खालरा के अचानक गायब होने से पूरे पंजाब में एक जन आक्रोश ने फैल गया । लोग ये जानना चाहते थे कि जसवंत सिंह खालरा कहां हैं और किस हाल में हैं। पंजाब सरकार पर जसवंत सिंह को खोजने का दबाव लगातार बढ़ रहा था। ऐसे में सरकार ने ये केस सीबीआई को सौंप दिया।
इसके बाद सीबीआई ने मामले की जांच करना शुरू किया और पता लगाया कि जसवंत सिंह खालरा को अगवा करने के पीछे तरन तारन पुलिस का हाथ था। सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट कोर्ट में पेश की और तरन तारन के एसएसपी अजीत सिंह संधू समेत पांच पुलिस वालों को दोषी ठहराया। लंबी सुनवाई और कई गवाहों की गवाही के आधार पर अदालत ने माना कि जसवंत सिंह खालरा की हत्या के पीछे एसएसपी तरन तारन और उनके सहयोगियों का ही हाथ था। कोर्ट ने सभी आरोपियों को उम्र कैद की सजा सुनाई।
जसवंत सिंह खालरा की मौत के 31 साल बाद अब उनकी कहानी पर सतलुज (पंजाब 95) नाम से एक फिल्म बनी है। जिसे निर्देशक हनी त्रेहान ने बनाया है। हालांकि, सरकार इस फिल्म की रिलीज को लेकर शुरू से ही असहज नजर आई है। सबसे पहले CBFC ने मेकर्स से इसका नाम बदलने के लिए कहा जिसे उन्होंने मान भी लिया।
इसके बाद बोर्ड ने फिल्म में 127 कट लगाने के लिए आदेश दिया। हनी त्रेहान ने बोर्ड के इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया। इसके चलते ये फिल्म तीन साल का सर्टिफिकेशन के लिए अटकी रही। इस दौरान मेकर्स ने अदालत का भी दरवाजा खटखटाया और अंत में बिना किसी कट के सिनेमा हॉल की जगह ओटीटी पर रिलीज कर दिया।
आज के दौर में जहां छोटी से छोटी फिल्म को बड़े पैमाने पर प्रमोट किया जाता है। मेकर्स ने ऐसा कुछ नहीं किया और चुपचाप बिना किसी शोर शराबे के जी5 पर रिलीज कर दिया। लेकिन जैसे ही ये फिल्म जी5 पर रिलीज हुई वर्ड ऑफ माउथ और सोशल मीडिया के जरिए ग्लोबल सेंसेशन बन गई। जिसके बाद CBFC ने फिल्म के भारत में स्ट्रीम होने पर रोक लगा दी। सरकार का मानना है कि यह फिल्म पंजाब के लोगों को भड़का सकती है, जिससे कानून व्यवस्था बिगड़ सकती है। हालांकि, जी5 ने बयान जारी करते हुए कहा है कि वो जल्द हीइस समस्या का समाधान निकालकर फिल्म को भारतीय दर्शकों तक दोबारा पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।
https://youtu.be/HzUoCmCdqKc