बंगाल चुनाव: रिकॉर्ड वोटिंग और सत्ता परिवर्तन का क्या है कनेक्शन? जानें 1967 और 2011 के चौंकाने वाले आंकड़े
West Bengal Elections History: पश्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास में भारी मतदान अक्सर सत्ता विरोधी लहर का संकेत देता दिख रहा है। जानें कैसे 1977 और 2011 के चुनाव परिणामों ने राज्य की राजनीतिक दिशा बदल दी।
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
बंगाल चुनाव, फोटो- नवभारत डिजाइन
Anti-Incumbency @ West Bengal: पश्चिम बंगाल की राजनीति और वहां के मतदाताओं का मिजाज हमेशा से विश्लेषकों के लिए शोध का विषय रहा है। राज्य के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो एक स्पष्ट पैटर्न उभर कर सामने आता है: जब-जब मतदान के प्रतिशत में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है, तब-तब सत्ता के गलियारों में बड़े बदलाव देखे गए हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उच्च मतदान अक्सर मौजूदा सरकार के खिलाफ जनता के गुस्से और बदलाव की इच्छा का प्रतीक होता है।
साधारण शब्दों में कहें तो राजनीतिक निरंतरता अक्सर मतदाताओं की उदासीनता पर निर्भर करती है, जबकि सत्ता परिवर्तन के लिए बड़े पैमाने पर जन-लामबंदी की जरुरत होती है। भारत के अन्य राज्यों की तरह पश्चिम बंगाल में भी यह देखा गया है कि जब मतदाता बदलाव के लिए प्रेरित होते हैं, तो वे वर्ग भी मतदान करने निकलते हैं जो आमतौर पर चुनावी प्रक्रिया से दूर रहना पसंद करते हैं।
1967 के ऐतिहासिक आंकड़े
बंगाल में इस पैटर्न की शुरुआत 1960 के दशक में हुई थी। 1962 में, जब कांग्रेस का दबदबा था, तब मतदान केवल 53% था। लेकिन 1967 में, जब यूनाइटेड फ्रंट एक विकल्प के रूप में उभरा, तो मतदान प्रतिशत बढ़कर 62.5% हो गया। वोटिंग प्रतिशत ज्यादा होने के साथ-साथ सरकार भी बदल गई। इसके बाद से ही ज्यादा वोट पड़ने का मतलब बंगाल में सत्ता परिवर्तन माना जाने लगा।
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पिछले विधानसभा चुनाव के आंकड़े, सोर्स- ECI
हालांकि, 1977 का चुनाव एक अपवाद माना जाता है। आपातकाल के बाद हुए इस चुनाव में मतदान केवल 55.2% था, फिर भी लेफ्ट फ्रंट सत्ता में आया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कम मतदान राजनीतिक उदासीनता के कारण नहीं, बल्कि आपातकाल के दौरान के दमन और भय के माहौल की वजह से था। इसके बाद, 1982 तक मतदान 75.1% तक पहुंच गया, जिसने लेफ्ट फ्रंट के तीन दशक लंबे शासन को मजबूती दी।
2011 में जब 84.5% मतदान ने रचा इतिहास
सत्ता परिवर्तन और मतदान के बीच सबसे मजबूत कड़ी 2011 के विधानसभा चुनावों में देखी गई। सिंगूर और नंदीग्राम के भूमि अधिग्रहण विवादों के कारण लेफ्ट फ्रंट के खिलाफ भारी असंतोष था। इसका नतीजा यह हुआ कि राज्य में रिकॉर्ड 84.5% मतदान हुआ, जिसने 34 साल पुराने वामपंथी शासन को उखाड़ फेंका और ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस (AITC) की सत्ता में वापसी कराई।
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क्या 2026 में भी दिखेगा यही रुझान?
2011 के बाद से, पश्चिम बंगाल एक ‘हाइपर-एंगेज्ड’ मतदाता वर्ग के रूप में विकसित हुआ है, जहां 2016 और 2021 के चुनावों में भी मतदान 80% से ऊपर है। आगामी 2026 के विधानसभा चुनावों को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं कि क्या लेफ्ट फ्रंट या अन्य विपक्षी दल इस उच्च भागीदारी का लाभ उठाकर वापसी कर पाएंगे। वर्तमान स्थिति यह बताती है कि बंगाल में अब उच्च मतदान एक सामान्य प्रक्रिया बन चुकी है, भले परिणाम कुछ भी हो।
