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West Bengal Assembly Election 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति जब मैदानों से निकलकर पहाड़ों की घुमावदार वादियों में पहुंचती है, तो वहां की फिजां और चुनावी समीकरण दोनों पूरी तरह बदल जाते हैं। अगले महीने होने वाले विधानभा चुनावों के लिए राज्य की 294 सीटों पर बिसात बिछ चुकी है। दिलचस्प बात यह है कि जहां राज्य की अधिकांश सीटों पर चार प्रमुख ताकतों के बीच मुकाबला सिमटा हुआ है, वहीं दार्जिलिंग, कलिम्पोंग और कुर्सियांग जैसी ‘पहाड़ों की रानी’ कही जाने वाली सीटों पर इस बार ‘पंचकोणीय’ संघर्ष देखने को मिल रहा है।
यह केवल पांच उम्मीदवारों की लड़ाई नहीं है, बल्कि पहाड़ों के भविष्य और पहचान की एक नई जंग है, जिसे हर दल अपने-अपने चश्मे से देख रहा है। एक आम पाठक के लिए यह समझना जरूरी है कि मैदान की राजनीति से अलग पहाड़ों में इस बार कौन से नए समीकरण बन रहे हैं।
पश्चिम बंगाल की अधिकांश सीटों पर मुकाबला तृणमूल कांग्रेस, भाजपा, वाम मोर्चा-एआईएसएफ गठबंधन और कांग्रेस के बीच सिमटा हुआ है। लेकिन दार्जिलिंग की पहाड़ियों में प्रवेश करते ही यह चुनावी तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है। यहां की तीन महत्वपूर्ण सीटों- कुर्सियांग, कलिम्पोंग और दार्जिलिंग पर चुनावी लड़ाई अब पंचकोणीय हो चुकी है।
इन क्षेत्रों में भाजपा को बिमल गुरुंग के गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (GJM) का साथ मिला है, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने अनित थापा के भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा (BGPM) पर भरोसा जताया है। इसके साथ ही वाम मोर्चा-एआईएसएफ गठबंधन और कांग्रेस भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं, जिससे मुकाबला अब तक का सबसे पेचीदा मोड़ ले चुका है।
इस बार के पहाड़ी चुनाव में सबसे बड़ा ‘एक्स-फैक्टर’ बनकर उभरे हैं अजय एडवर्ड्स और उनकी पार्टी भारतीय गोरखा जनशक्ति मोर्चा (IGJF)। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आईजीजेएफ का स्वतंत्र रूप से चुनावी मैदान में उतरना जीजेएम समर्थित भाजपा और बीजीपीएम समर्थित तृणमूल कांग्रेस, दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। इन क्षेत्रों में गोरखा मतदाता ही जीत और हार का फैसला करते हैं, और एडवर्ड्स की लोकप्रियता ने स्थापित दलों के पसीने छुड़ा दिए हैं।
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हालांकि, हर दल सार्वजनिक रूप से यही दावा कर रहा है कि आईजीजेएफ के आने से उनकी राह आसान हुई है। भाजपा का तर्क है कि एडवर्ड्स भाजपा विरोधी गोरखा वोटों में सेंध लगाएंगे, जबकि तृणमूल का मानना है कि वे भाजपा के कोर वोट बैंक को नुकसान पहुंचाएंगे।
इस पूरे राजनीतिक घमासान के केंद्र में वह ‘अधूरा वादा’ है जिसे वर्षों से चुनावी मुद्दा बनाया जाता रहा है। आईजीजेएफ प्रमुख अजय एडवर्ड्स स्थापित दलों के दावों को सिरे से खारिज करते हैं। उनका कहना है कि पहाड़ों के लोग, विशेषकर गोरखा समुदाय, अलग गोरखालैंड राज्य की मांग और अन्य स्थायी समाधानों को लेकर किए गए झूठे वादों से अब पूरी तरह निराश हो चुके हैं।
एजेंसी इनपुट के साथ