शुवेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी, फोटो- AI
Results 2021 Analysis: पश्चिम बंगाल की राजनीति में साल 2021 का विधानसभा चुनाव बेहद अहम था। यह केवल एक राज्य का चुनाव नहीं था बल्कि इसे पूरे देश के सबसे बड़े राजनीतिक दंगल के रूप में देखा गया था। एक ओर ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस अपनी सत्ता बचाने के लिए संघर्ष कर रही थी तो दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पूरी शक्ति बंगाल की धरती पर झोंक दी थी।
समूचे चुनावी माहौल में दीदी बनाम दिल्ली का नारा गूंज रहा था और हर किसी की नजर कोलकाता के नतीजों पर टिकी थी। जब परिणाम सामने आए तो उन्होंने न केवल राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया बल्कि बंगाल की सियासत की एक नई दिशा भी तय कर दी। इस चुनाव में भाजपा ने टीएमसी के किले में बड़ी सेंध लगाई थी।
ममता बनर्जी ने इस पूरे चुनाव को अपनी व्यक्तिगत साख और लोकप्रियता के इर्द-गिर्द समेट लिया था। उन्होंने बहुत ही प्रभावशाली ढंग से खुद को बंगाल की बेटी के रूप में पेश किया जिससे आम मतदाताओं के बीच एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव पैदा हुआ। नंदीग्राम में चुनाव प्रचार के दौरान लगी चोट के बावजूद व्हीलचेयर पर बैठकर प्रचार करने की उनकी तस्वीर ने जनता की सहानुभूति बटोरने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई।
तृणमूल कांग्रेस ने बहुत ही चतुराई से इस लड़ाई को बाहरी बनाम बंगाली पहचान का मुद्दा बना दिया था। खेला होबे जैसे नारों ने स्थानीय युवाओं और आम मतदाताओं को पार्टी के साथ मजबूती से जोड़ दिया जिससे भाजपा की पहचान एक बाहरी दल के रूप में सिमट कर रह गई।
तृणमूल कांग्रेस की इस प्रचंड जीत की नींव में उनकी सरकार द्वारा पिछले वर्षों में चलाई गई जनकल्याणकारी योजनाओं का भी बड़ा योगदान रहा। कन्याश्री और रूपश्री जैसी योजनाओं ने राज्य की महिलाओं के जीवन में सीधा बदलाव लाने का काम किया था। इसके अलावा छात्रों के लिए शुरू की गई सबूज साथी साइकिल योजना ने ग्रामीण इलाकों में पार्टी की पहुंच को और अधिक गहरा कर दिया था।
यही कारण था कि चुनाव के दौरान महिला मतदाताओं ने तमाम दावों को दरकिनार कर बढ़-चढ़कर ममता बनर्जी के पक्ष में मतदान किया। साथ ही मुस्लिम मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा भी तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में पूरी तरह एकजुट हुआ जिससे विपक्षी वोटों का बिखराव रुक गया। तृणमूल का मजबूत जमीनी संगठन और बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की पकड़ भाजपा की चुनावी मशीनरी पर भारी पड़ती दिखाई दी।
भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल के इस महासमर में अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था लेकिन कुछ रणनीतिक कमियां उन्हें भारी पड़ गईं। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के ताबड़तोड़ प्रचार के बावजूद पार्टी के पास राज्य स्तर पर कोई ऐसा कद्दावर चेहरा नहीं था जो ममता बनर्जी के व्यक्तित्व का मुकाबला कर सके। भाजपा का पूरा अभियान मुख्य रूप से केंद्रीय नेतृत्व के इर्द-गिर्द घूमता रहा जिससे स्थानीय मुद्दों की जगह राष्ट्रीय मुद्दे ज्यादा हावी हो गए।
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पार्टी ने दूसरी पार्टियों से आए नेताओं पर जरूरत से ज्यादा भरोसा जताया जिससे उनके पुराने कार्यकर्ताओं में अंदर ही अंदर असंतोष फैल गया। उम्मीदवार चयन में हुई गड़बड़ी और हिंदुत्व के नैरेटिव का बंगाल की अपनी स्थानीय पहचान से टकराना भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। शुवेंदु अधिकारी के प्रयास ने भाजपा को बड़ी बढ़त दिलाई थी।
अगर आंकड़ों की बात करें तो भाजपा का प्रदर्शन पूरी तरह से निराशाजनक भी नहीं था क्योंकि पार्टी का वोट शेयर करीब 38 प्रतिशत के सम्मानजनक स्तर तक पहुंच गया था। साल 2016 के मुकाबले यह एक बहुत बड़ी छलांग थी लेकिन पार्टी इस जनसमर्थन को सीटों के आंकड़े में तब्दील करने में पूरी तरह सफल नहीं हो सकी।
तृणमूल कांग्रेस करीब 48 प्रतिशत वोट हासिल कर 213 सीटों के विशाल बहुमत के साथ दोबारा सत्ता में लौटी। भाजपा केवल 77 सीटों पर सिमट कर रह गई जबकि कांग्रेस और वामदलों का लगभग सूपड़ा साफ हो गया। यह चुनाव स्पष्ट रूप से सिखाता है कि बंगाल में सत्ता की असली चाबी स्थानीय जुड़ाव और जनता के प्रति जवाबदेही में छिपी है। अब 2026 की अगली जंग के लिए यह बड़ा सवाल बना हुआ है कि क्या भाजपा अपनी रणनीति में कोई बुनियादी बदलाव करेगी।