टीवीके की आंधी में लड़खड़ा गया बीजेपी का तमिलनाडु अभियान, महज एक सीट से करना पड़ा संतोष
Tamil Nadu Politics: तमिलनाडु में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटी बीजेपी को बड़ा झटका लगा है। AIADMK के नेतृत्व वाले NDA के तहत 27 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद पार्टी को सिर्फ एक सीट मिली।
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
थलपति विजय, फोटो- नवभारत डिजाइन
Tamil Nadu Assembly Election Results: भाजपा ने ठीक एक साल पहले एआईएडीएमके के साथ गठबंधन किया और 2026 के विधानसभा चुनावों में 2021 की तुलना में अधिक सीटों के साथ चुनावी मैदान में उतरे। साल 2024 के लोकसभा चुनावों में अपने बेहतर प्रदर्शन और जरुरी निर्वाचन क्षेत्रों में सीनीयर लीडर्स की तैनाती के बल पर पार्टी ने उम्मीद लगाई थी कि वह अपने संगठनात्मक बल को चुनावी लाभ में बदल ले जाएगी। यह रणनीति जमीनी स्तर पर फेल हो गई।
इस चुनाव में नैनार नागेन्द्रन, एल. मुरुगन, तमिलिसाई सौंदराजन और वनथी श्रीनिवासन सहित कई बड़े नेताओं को हार का सामना करना पड़ा है। उनकी हार ने पार्टी के भीतर आंतरिक समीक्षा को तेज कर दिया है और नेतृत्व रणनीति तथा चुनाव प्रचार के क्रियान्वयन पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सिमटकर रह गए सभी दल
पार्टी के सहयोगी दल भी चुनावी प्रभाव डालने में विफल रहे। जी.के. वासन के नेतृत्व वाली तमिल मानिला कांग्रेस (मूपानार) गठबंधन व्यवस्था के तहत लड़ी गई सभी पांच सीटों पर हार गई। अन्य छोटे सहयोगी दल भी अपनी उपस्थिति को जीत में तब्दील नहीं कर सके, जो गठबंधन की वोट हस्तांतरण प्रणाली की व्यापक विफलता को दर्शाता है।
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अब सवाल उठता है कि ये हुआ कैसे। कागज पर भारी भरकम दिखने वाली ये टीम जमीन पर धाराशाई कैसे हो गई? इसका जवाब है- थलपति विजय। भाजपा के खराब प्रदर्शन का सबसे बड़ा कारण अभिनेता-राजनेता विजय की पार्टी टीवीके का उदय था, जिसने पारंपरिक मतदान पैटर्न को ध्वस्त कर दिया।
शहरी वोटर को लुभा ले गए विजय
शहरी मतदाताओं और युवाओं के बीच पार्टी की प्रबल लोकप्रियता ने कई निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा के समर्थन आधार को कमजोर कर दिया है। इस फैसले ने राज्य नेतृत्व को भी सवालों के घेरे में ला दिया है और प्रमुख नेताओं के प्रदर्शन की बारीकी से जांच की जा रही है। इसके साथ ही वरिष्ठ नेताओं की हार ने संभावित संगठनात्मक परिवर्तनों पर चर्चा को जन्म दिया है, जिसमें राज्य इकाई और केंद्र में पार्टी के प्रतिनिधित्व में फेरबदल शामिल है।
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इस चुनाव में मिली करारी हार के बाद भाजपा अब कुछ बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है। साफ है कि इस हार का असर 2027 के स्थानीय निकाय चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले पार्टी की रणनीति पर पड़ने की उम्मीद है, क्योंकि पार्टी राजनीतिक रूप से बदलते परिदृश्य में अपना आधार फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
