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Kerala Assembly Election 2026: केरलम के कन्नूर जिले की शांत पहाड़ियों और रबर के बागानों के बीच बसा पेरावूर विधानसभा क्षेत्र इस वक्त एक ‘सियासी ज्वालामुखी’ बना हुआ है। वैसे तो यह इलाका अपनी प्राकृतिक सुंदरता और खेती-किसानी के लिए जाना जाता है, लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव ने इसे राज्य के सबसे बड़े सियासी अखाड़े में तब्दील कर दिया है।
पेरावूर में मुकाबला सिर्फ दो उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं और दो कद्दावर शख्सियतों की साख के बीच है। एक तरफ कांग्रेस के ‘अजेय’ योद्धा सनी जोसेफ हैं, तो दूसरी तरफ वामपंथ का सबसे बड़ा चेहरा और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री के.के. शैलजा टीचर हैं।
केरलम की राजनीति में ‘टीचर’ के नाम से मशहूर के.के. शैलजा का पेरावूर के मैदान में उतरना किसी बड़े धमाके से कम नहीं है। 2021 में मट्टन्नूर सीट से रिकॉर्ड अंतर से जीतने वाली शैलजा को माकपा (CPI-M) ने इस बार कांग्रेस के इस गढ़ को ढहाने की जिम्मेदारी सौंपी है।
हालांकि, राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि उन्हें सुरक्षित सीट से हटाकर पेरावूर भेजना पार्टी के भीतर की प्रतिद्वंद्विता का हिस्सा हो सकता है, लेकिन शैलजा इन दावों को सिरे से खारिज करती हैं। उनका कहना है कि वे मूल रूप से पेरावूर की ही हैं और यहीं से उन्होंने अपना राजनीतिक सफर शुरू किया था। शैलजा को भरोसा है कि कोरोना काल में उनके द्वारा किए गए कार्यों और जमीनी स्तर पर उनकी पकड़ की वजह से जनता इस बार बदलाव के लिए तैयार है।
पेरावूर ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ का मजबूत किला रहा है। निवर्तमान विधायक और वर्तमान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष एडवोकेट सनी जोसेफ इस सीट से लगातार तीन बार जीत दर्ज कर चुके हैं। जोसेफ के लिए यह चुनाव उनकी प्रतिष्ठा का सवाल है क्योंकि वे न केवल स्थानीय विधायक हैं, बल्कि राज्य में कांग्रेस के बड़े चेहरा भी हैं। कुल मिलाकर इस सीट पर टक्कर कांटे की दिखाई दे रही है।
उनका तर्क है कि वे हर समय अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के बीच मौजूद रहते हैं और जनता उनके काम से पूरी तरह संतुष्ट है। हालांकि, 2021 के चुनावों में उनकी जीत का अंतर महज 3,172 वोट रह गया था, जो यह संकेत देता है कि वामपंथी गठबंधन यहां तेजी से अपनी जमीन मजबूत कर रहा है।
पेरावूर की चुनावी जंग में स्थानीय मुद्दे काफी गहरे हैं। यह एक ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्र है जहां की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से रबड़, काली मिर्च और मसालों की खेती पर टिकी है। यहां के किसानों, जिनमें बड़ी संख्या त्रावणकोर क्षेत्र से आए प्रवासी ईसाइयों की है, की अपनी समस्याएं हैं। सबसे बड़ा मुद्दा इंसान और जंगली जानवरों के बीच बढ़ता संघर्ष है, जिसने पहाड़ी इलाकों के लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है।
इसके अलावा बुनियादी ढांचा, रोजगार के अवसर और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब हर मतदाता तलाश रहा है। यहां का मतदाता किसी लहर के बजाय ठोस काम और उम्मीदवार की उपलब्धता के आधार पर फैसला लेने के लिए जाना जाता है।
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भले ही मुख्य मुकाबला एलडीएफ और यूडीएफ के बीच दिख रहा हो, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती मौजूदगी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 2021 में भाजपा उम्मीदवार को करीब 6.44% वोट मिले थे, जो यह बताता है कि यहां बहुकोणीय मुकाबला अब और तीव्र हो रहा है।
इस बार भाजपा ने भी अपनी सक्रियता बढ़ाई है, जिससे वोटों के ध्रुवीकरण की संभावना बढ़ गई है। 1.77 लाख से अधिक मतदाताओं वाले इस क्षेत्र में मतदान का प्रतिशत अक्सर 80% के पार रहता है, जो जनता की राजनीतिक भागीदारी को दर्शाता है।