असम चुनाव: हिमंता का छात्र नेता से सीएम तक का सफर; कांग्रेस का वो ‘इंपोर्ट’ जिसने पूर्वोत्तर में खिलाया कमल
Assam Politics: असम के 15वें सीएम हिमंता बिस्वा सरमा का राजनीतिक सफर किसी फिल्म से कम नहीं है। कांग्रेस के बड़े नेता से लेकर BJP के 'पूर्वोत्तर के चाणक्य' बनने तक, उनका सफर उपलब्धियों की कहानी कहता है
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
हिमंता बिस्वा सरमा, फोटो- सोशल मीडिया
Himanta Biswa Sarma Profile: असम की राजनीति में हिमंता बिस्वा सरमा ऐसे नाम हैं जिन्हें आज के समय का सबसे प्रभावशाली और ‘मैकियावेलियन’ राजनेता माना जाता है। 10 मई 2021 को असम के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले सरमा ने न केवल कांग्रेस के गढ़ को ढहाया, बल्कि पूर्वोत्तर भारत में भाजपा की सफलता की इबारत लिखी।
एक समय पर कांग्रेस के संकटमोचक रहे सरमा आज भाजपा के सबसे प्रखर चेहरों में से एक हैं, लेकिन उनकी यह यात्रा वैचारिक बदलावों और कई विवादों से भरी रही है। हिमंता के बारे में ये कुछ खास बातें हैं-
छात्र राजनीति से सीएम तक- ‘जलुकबारी’ का अजेय योद्धा
1 फरवरी 1969 को जोरहाट में जन्मे हिमंता बिस्वा सरमा का रुझान बचपन से ही राजनीति की ओर था। महज 10 साल की उम्र में उन्होंने अपना पहला सार्वजनिक भाषण दिया था। असम आंदोलन के दौरान वे संदेशवाहक के रूप में काम किया करते थे। गुवाहाटी के प्रतिष्ठित कॉटन कॉलेज से राजनीति विज्ञान में स्नातक और स्नातकोत्तर करने के बाद उन्होंने पीएचडी और एलएलबी की डिग्री हासिल की। उनकी राजनीतिक ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वे जलुकबारी निर्वाचन क्षेत्र से 2001 से लगातार पांच बार चुनाव जीत चुके हैं- तीन बार कांग्रेस के टिकट पर और दो बार भाजपा के।
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2015 का वो ‘दलबदल’
हिमंता बिस्वा सरमा का कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होना भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित मोड़ों में से एक है। अगस्त 2015 में भाजपा में शामिल होने से ठीक एक महीने पहले, भाजपा ने ही उन्हें एक भ्रष्टाचार घोटाले में ‘प्रमुख संदिग्ध’ बताया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई से मतभेदों के बाद उन्होंने कांग्रेस का साथ छोड़ा। दिलचस्प बात यह है कि 2014 में कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने नरेंद्र मोदी पर तीखे हमले किए थे, लेकिन आज वे उन्हीं के सबसे भरोसेमंद योद्धा माने जाते हैं। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि भाजपा में शामिल होने के बाद उनके खिलाफ चल रही जांचें ठंडे बस्ते में चली गईं।
आरएसएस की पृष्ठभूमि नहीं, फिर भी सबसे ‘प्रखर’ चेहरा
भाजपा के भीतर सरमा की स्थिति विशिष्ट है क्योंकि वे पारंपरिक रूप से आरएसएस (RSS) की पृष्ठभूमि से नहीं आते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों और विरोधियों, जैसे गौरव गोगोई का मानना है कि अपनी इस ‘लिमिटेशन’ को दूर करने के लिए सरमा को विचारधारा के मोर्चे पर अन्य नेताओं से कहीं अधिक सक्रिय और आक्रामक प्रदर्शन करना पड़ता है। वे भाजपा में नई पीढ़ी के अग्रणी नेताओं में गिने जाते हैं और पूर्वोत्तर के सात राज्यों में भाजपा को मजबूत करने का श्रेय काफी हद तक उन्हीं को दिया जाता है।
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विवादों से परे, एक मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल को प्रशासनिक उपलब्धियों के लिए भी याद किया जाता है। 2001 से 2021 के बीच उन्होंने वित्त, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभागों को संभाला। शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने भर्ती प्रक्रिया से साक्षात्कार सिस्टम को खत्म किया और टीईटी के माध्यम से पारदर्शी तरीके से 50,000 से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति की। भारत सरकार ने भी अपनी वार्षिक रिपोर्टों में उनके नेतृत्व में असम के स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में हुई प्रगति की सराहना की है।
