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Assembly Election 2026: भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कभी माना जाता था कि राजनीति केवल पुरुषों का मैदान है और घर की महिलाएं उन्हीं के कहे अनुसार वोट डालती हैं, लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।
आज 9 अप्रैल को हो रहे विधानसभा चुनावों में असम, केरल और पुडुचेरी के मतदान केंद्रों पर जो लंबी कतारें दिख रही हैं, उनमें महिलाओं की हिस्सेदारी पुरुषों से कहीं ज्यादा नजर आ रही है। यह केवल एक दिन का उत्साह नहीं है, बल्कि यह उस ‘जेंडर पॉलिटिक्स’ का परिणाम है, जिसने पिछले कुछ सालों में भारत की राजनीतिक बिसात को पूरी तरह से पलट कर रख दिया है।
आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि देश की ‘आधी आबादी’ अब लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है। साल 2024 के लोकसभा चुनावों ने एक ऐसा ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाया, जिसने जानकारों को भी चौंका दिया। पहली बार महिला मतदाताओं का टर्नआउट 65.78 प्रतिशत रहा, जो पुरुष मतदाताओं के 65.55 प्रतिशत के मुकाबले कहीं अधिक था। लगभग 31.2 करोड़ महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया, जो भारतीय इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है।
यह महिला लहर लोकसभा तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि इसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में और भी तेज हो गई। झारखंड में तो 43 में से 37 सीटों पर महिलाओं ने पुरुषों से कहीं ज्यादा बढ़-चढ़कर वोट डाले। यह रुझान साफ करता है कि महिलाएं अब घर के भीतर लिए गए फैसलों को पोलिंग बूथ तक ले जा रही हैं और अपनी स्वतंत्र पहचान बना रही हैं।
इस बदलाव के पीछे कोई जादू नहीं, बल्कि वे योजनाएं हैं जो महिलाओं के हाथ में सीधे तौर पर ताकत सौंपती हैं। जब किसी महिला के बैंक खाते में बिना किसी बिचौलिए के सीधे पैसे पहुंचते हैं, तो सत्ता के प्रति उसका विश्वास और भी गहरा हो जाता है।
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महाराष्ट्र की ‘माझी लड़की बहिण योजना‘ हो या झारखंड की ‘मंईयां सम्मान योजना’, इन सबने महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया है। बिहार में भी ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ के तहत मिलने वाली 10,000 रुपये से लेकर 2 लाख रुपये तक की मदद का असर यह हुआ कि वहां महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से करीब 9 प्रतिशत ज्यादा रहा। जब महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा मिलती है, तो वे एक स्वतंत्र वोट बैंक के रूप में उभरती हैं, जो किसी के दबाव में नहीं बल्कि अपने लाभ और सम्मान के लिए वोट देती हैं।
राजनीतिक दलों के लिए अब यह साफ संदेश है कि चुनाव अब केवल जाति या धर्म के पुराने समीकरणों से नहीं जीते जा सकते। अब चुनावी घोषणापत्रों के केंद्र में युवा और पुरुष नहीं, बल्कि महिलाएं भी खड़ी हैं। पार्टियां समझ चुकी हैं कि महिला वोटर एक स्वतंत्र सोच रखती हैं और वे उस पार्टी को चुनती हैं जो उनकी सुरक्षा और सम्मान की गारंटी देती है।