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Clone Candidates in Assembly Elections: लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव में जब मतदाता ईवीएम के सामने खड़ा होता है, तो उसे उम्मीद होती है कि उसका एक वोट सही उम्मीदवार की किस्मत तय करेगा। लेकिन कल्पना कीजिए कि जब आप अपने पसंदीदा नेता को वोट देने जाएं और बैलेट यूनिट पर आपको एक ही नाम के तीन अलग-अलग चेहरे और चुनाव चिन्ह नजर आएं, तो आपकी स्थिति क्या होगी?
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है, जिसने न केवल चुनाव अधिकारियों को उलझन में डाल दिया है, बल्कि आम जनता के बीच भी भ्रम पैदा कर दिया है। उत्तर से लेकर दक्षिण तक, सियासी मैदान में ‘नाम’ की यह पेचीदा पहेली इस वक्त चर्चा का सबसे बड़ा केंद्र बनी हुई है। यह महज एक इत्तेफाक नहीं है, बल्कि राजनीति के उस शतरंज की चाल है जहां विपक्षी की जीत रोकने के लिए हमनाम उम्मीदवारों की ‘क्लोन सेना’ तैयार की जाती है।
पश्चिम बंगाल की आसनसोल उत्तर विधानसभा सीट पर मंगलवार को नामांकन पत्रों की जांच के दौरान एक बेहद अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो गई। जैसे ही निर्वाचन अधिकारी ने उम्मीदवारों के नाम पुकारना शुरू किया, पूरा हॉल सन्नाटे में डूब गया। अधिकारियों ने पहले ‘कृष्णेंदु मुखोपाध्याय’ (निर्दलीय) का नाम पुकारा, फिर ‘कृष्णेंदु चटर्जी’ (निर्दलीय) और अंत में बारी आई भारतीय जनता पार्टी के आधिकारिक प्रत्याशी ‘कृष्णेंदु मुखर्जी’ की।
एक ही सीट पर एक ही नाम के तीन-तीन उम्मीदवारों की मौजूदगी ने कुछ देर के लिए वहां मौजूद हर शख्स को हैरत में डाल दिया। इस स्थिति ने साफ कर दिया है कि चुनावी बिसात पर अब सिर्फ वादे और दावे काम नहीं आ रहे, बल्कि मतदाताओं के दिमाग के साथ खेलने के लिए नामों का सहारा लिया जा रहा है।
इस अनोखे घटनाक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा उम्मीदवार कृष्णेंदु मुखर्जी ने इसे विरोधियों की हताशा का प्रतीक बताया है। उन्होंने बेहद चुटीले अंदाज में कहा कि नामांकन के दौरान जब बार-बार उनका नाम गूंज रहा था, तो वह खुद भी कुछ पलों के लिए भ्रमित हो गए थे कि असली दावेदार कौन है।
कृष्णेंदु मुखर्जी ने तंज कसते हुए कहा कि ऐसा लगता है ‘कृष्णेंदु’ नाम इतना मशहूर हो गया है कि दूसरों को भी इसी का सहारा लेना पड़ रहा है। उन्होंने इसे विपक्षी दलों की एक सोची-समझी साजिश करार दिया, जिसका मकसद केवल वोट बैंक में सेंध लगाना और मुख्य उम्मीदवार के वोटों का बंटवारा करना है।
बंगाल जैसी ही स्थिति सुदूर दक्षिण में तमिलनाडु के चेन्नई में भी देखने को मिल रही है, जहां सुपरस्टार से राजनेता बने विजय और उनकी पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कझगम’ (TVK) को निशाना बनाया गया है। चेन्नई की पेरम्बूर सीट पर, जहां से विजय खुद चुनाव लड़ रहे हैं, वहां दो और ‘विजय’ मैदान में उतर आए हैं। सिर्फ पेरम्बूर ही नहीं, बल्कि रॉयापुरम में डी जयकुमार के सामने तीन हमनाम उम्मीदवार हैं और चेपॉक-त्रिप्लिकेन में उधयनिधि स्टालिन के खिलाफ खड़े TVK उम्मीदवार डी सेल्वम के भी तीन ‘डुप्लीकेट’ (Clone Candidates) मौजूद हैं।
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TVK समर्थकों का आरोप है कि इन सभी हमनाम उम्मीदवारों के हलफनामे एक ही नोटरी वकील द्वारा सत्यापित कराए गए हैं, जो इस ओर इशारा करता है कि इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक मास्टरमाइंड काम कर रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि करीबी मुकाबलों में हमनाम उम्मीदवार उतारना एक पुरानी रणनीति रही है। उदाहरण के तौर पर चेन्नई की 16 सीटों पर इस बार कुल 628 उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनमें से पेरम्बूर में सबसे ज्यादा 66 प्रत्याशी हैं। अब इतनी लंबी लिस्ट में एक ही नाम के कई उम्मीदवारों का होना किसी भी सामान्य मतदाता को असमंजस में डाल सकता है।