बंगाल में कांग्रेस अकेले क्यों लड़ रही है चुनाव, क्या 2026 में अकेले लड़कर वापसी कर पाएगी पार्टी?
INC in Bengal: पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय से हाशिए पर रही कांग्रेस ने 2026 विधानसभा चुनाव अकेले लड़ रही है। जानिए पार्टी आलाकमान की तरफ से किसी गठबंधन में शामिल न होने का फैसला क्यों लिया।
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
राहुल गांधी और खरगे, फोटो- सोशल मीडिया
West Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल में चुनावी बिसात बिछने के साथ ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक साहसिक और रणनीतिक फैसला लिया। पिछले कई चुनावों में गठबंधन की राजनीति करने के बाद, पार्टी राज्य में सभी 294 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी कर ली है।
यह निर्णय दिल्ली में हुई पार्टी की अहम बैठक के बाद लिया गया, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और राज्य की वरिष्ठ नेतृत्व मौजूद रहा। बैठक के बाद पार्टी के राज्य प्रभारी ग़ुलाम अहमद मीर ने कहा, “चर्चा के बाद यह तय किया गया है कि कांग्रेस पश्चिम बंगाल की सभी 294 सीटों पर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ेगी और उसी हिसाब से तैयारी करेगी।”
क्या एकला चलो की राह इतनी आसान है?
यह फैसला पार्टी के भीतर चल रही उस लंबी बहस का परिणाम है जिसमें अपनी अलग पहचान और अस्तित्व को बचाने की मांग उठ रही थी। हालांकि, बंगाल के वर्तमान में TMC बनाम BJP वाले राजनीतिक माहौल में यह कदम कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती लेकर आया है।
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अकेले चुनाव लड़ने के पीछे की रणनीति क्या है?
कांग्रेस का हालिया चुनावी इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है। साल 2011 में तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन में पार्टी ने कुछ सफलता पाई थी, वहीं 2016 में लेफ्ट मोर्चे के साथ मिलकर करीब 44 सीटें जीती थीं। लेकिन 2021 के चुनावों में लेफ्ट और ISF के साथ गठबंधन के बावजूद पार्टी शून्य पर सिमट गई और उसका वोट शेयर 12% से गिरकर महज 3-4% रह गया। इसी गिरावट को रोकने के लिए पार्टी अब एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में खुद को पेश करना चाहती है ताकि गठबंधन के कारण उसकी पहचान धुंधली न हो।
कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि अकेले लड़ने से पार्टी को दीर्घकालिक विकास का मौका मिलेगा। जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं में नया जोश भरना और संगठन का विस्तार करना। गठबंधन में शीर्ष नेताओं की दृश्यता कम हो जाती है, अकेले लड़ने से नए नेताओं को उभरने के लिए जगह मिलेगी। पार्टी का ध्यान अपने पारंपरिक मतदाताओं, अल्पसंख्यकों और धर्मनिरपेक्ष वोटों को वापस लाने पर है। कांग्रेस उन मतदाताओं को आकर्षित करना चाहती है जो न तो TMC से संतुष्ट हैं और न ही BJP को वोट देना चाहते हैं।
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फायदे कम और जोखिम ज्यादा!
राजनीतिक पंडितों की मानें तो अकेले लड़ने का यह फैसला ‘हाई-रिस्क, हाई-रेवॉर्ड’ रणनीति है। इसका सबसे बड़ा नुकसान वोटों का बंटवारा हो सकता है, जिससे विरोधी मत बंटने का सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है। इसके अलावा, कई जिलों में कांग्रेस का संगठन कमजोर है और बूथ स्तर पर मौजूदगी सीमित है। TMC और BJP के विशाल संसाधनों और आक्रामक चुनाव प्रचार के मुकाबले कांग्रेस के पास संसाधनों की भी कमी है। 2021 के ‘जीरो’ प्रदर्शन के कारण पार्टी के पास चुनावी गति की भी कमी देखी जा रही है।
