सुवेंदु नहीं तो कौन? बंगाल में बीजेपी खेलेगी ‘सरप्राइज कार्ड’, सीएम फेस पर सस्पेंस! समझिए शाह के दौरे के मायने
West Bengal Politics: बंगाल में सीएम की कुर्सी के लिए अब तक सुवेंदु अधिकारी का नाम सबसे आगे है। अभी भी इसमें पेच फंसा दिखाई दे रहा है। एक्सपर्ट्स की मानें तो भाजपा एक बार फिर सरप्राइज दे सकती है।
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
सुवेंदु अधिकारी और अमित शाह, फोटो- AI Generated
CM Face of West Bengal: पश्चिम बंगाल में भाजपा ने रिकॉर्डतोड़ जीत हासिल की है। अब इसके बाद सबसे बड़ा पेच मुख्यमंत्री की सीट पर फंसता दिखाई दे रहा है। अक्सर ऐसा देखा गया है कि भाजपा कई मामलों में लीक से हटकर फैसले लेने के लिए जानी जाती है। एक्सपर्ट्स की मानें तो बंगाल में भी यही हाल देखने को मिल सकता है।
अक्सर देखा गया कि किसी राज्य में भाजपा की सरकार बनने के बाद किसी बड़े नेता को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा जाता है। इसका उद्देश्य सीएम-डिप्टी सीएम समेत अन्य मामलों में फंस रहे पेच को सुलझाने का होता है। हाल में अमित शाह के बंगाल जाने की खबर सामने आ रही है। सियासी पंडितों की मानें तो शाह का बंगाल जाना किसी बड़ी एक्टिविटी का संकेत हो सकता है।
सीएम कैंडिडेट की लिस्ट में सुवेंदु अधिकारी का नाम सबसे ऊपर है। सियासी हलकों में भी अधिकारी को सीएम का प्रबल दावेदार बताया जा रहा है। इसी बीच सूत्रों का दावा है कि बंगाल में सीएम के चेहरे के लिए अन्य कैंडिडेट्स की भी स्क्रूटनिंग की जा रही है। अक्सर भाजपा बड़े फैसलों को अंतिम समय तक गुप्त रखती है। अलग-अलग राज्यों में कई बार ऐसा हुआ है कि सीएम के रेस में चल रहे नाम पर मुहर ना लगी हो और किसी और चेहरे को सीएम चुन लिया गया। आइए जानते हैं हाल ही में ऐसा कब हुआ है।
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प्रवेश वर्मा थे दिल्ली के सीएम फेस, चुनी गईं रेखा गुप्ता
दिल्ली में हुए सियासी फैसले ने अब पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया सवाल खड़ा कर दिया है। आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल को हराने वाले बीजेपी नेता प्रवेश वर्मा को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया, जबकि उनकी जीत को चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश माना जा रहा था। इसके बजाय पार्टी ने अपेक्षाकृत कम चर्चित चेहरे रेखा गुप्ता को मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंप दी। इस फैसले के बाद अब नजरें पश्चिम बंगाल पर टिक गई हैं, जहां बीजेपी की बड़ी जीत के बीच मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर सस्पेंस बना हुआ है।
ठीक यही हुआ था जब राजस्थान में चुनाव हुए। वसुंधरा राजे को सीएम पद का दावेदार माना जा रहा था। अंत में राजनाथ सिंह ने भजनलाल शर्मा को सीएम पद के लिए कैंडिडेट बताया। इसकी चर्चा महीनों तक सियासी गलियारों में गूंजती रही।
भजनलाल शर्मा के नाम के घोषणा के समय की तस्वीर, फोटो- सोशल मीडिया
बंगाल में बीजेपी की बूम
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में बीजेपी ने 294 में से 200 से अधिक सीटें जीतकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया है। यह न सिर्फ सत्ता परिवर्तन है, बल्कि राज्य की राजनीति में एक बड़े युग परिवर्तन के तौर पर भी देखा जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस, जो पिछले चुनाव में 200 से ज्यादा सीटों के साथ सत्ता में थी, इस बार दोहरे अंकों के करीब सिमटती दिख रही है। सबसे बड़ा झटका पार्टी को तब लगा जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद अपनी सीट हार गईं।
ममता बनर्जी को हराने वाले नेता सुवेंदु अधिकारी इस चुनाव के सबसे बड़े चेहरे बनकर उभरे हैं। उन्होंने न सिर्फ मुख्यमंत्री को हराया, बल्कि पूरे चुनाव में बीजेपी के लिए फ्रंटलाइन लीडर की भूमिका निभाई। 2021 में भी नंदीग्राम से ममता बनर्जी को हराने के बाद शुवेंदु अधिकारी का कद तेजी से बढ़ा था, और 2026 में उनकी यह जीत उन्हें स्वाभाविक तौर पर मुख्यमंत्री पद का सबसे बड़ा दावेदार बनाती है।
क्या दिल्ली वाला मॉडल बंगाल में भी चलेगा?
दिल्ली का उदाहरण इस धारणा पर सवाल खड़ा करता है कि मुख्यमंत्री को हराने वाला नेता और बड़ा चेहरा ही अगला मुख्यमंत्री बनेगा। दिल्ली में प्रवेश वर्मा ने अरविंद केजरीवाल को हराकर बड़ी जीत दर्ज की थी, लेकिन बीजेपी ने मुख्यमंत्री के तौर पर रेखा गुप्ता को चुन लिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी अक्सर मुख्यमंत्री चयन में व्यक्तिगत जीत से ज्यादा संगठनात्मक संतुलन, सामाजिक समीकरण और दीर्घकालिक रणनीति को प्राथमिकता देती है।
प्रवेश वर्मा के साथ रेखा गुप्ता, फोटो- सोशल मीडिया
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बंगाल में अब तक सस्पेंस बरकरार
इसी पैटर्न को देखते हुए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या बंगाल में भी पार्टी कोई चौंकाने वाला फैसला ले सकती है। बीजेपी की रणनीति पर नजर डालें तो कई राज्यों में उसने ऐसे चेहरे को मुख्यमंत्री बनाया है, जो चुनावी जीत का मुख्य चेहरा नहीं थे, लेकिन संगठन और सामाजिक संतुलन के लिहाज से अधिक उपयुक्त माने गए। ऐसे में शुवेंदु अधिकारी के सामने चुनौती सिर्फ अपनी जीत नहीं, बल्कि पार्टी के व्यापक राजनीतिक समीकरणों में फिट बैठने की भी है।
एक्सपर्ट्स की राय क्या है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि पश्चिम बंगाल का मामला दिल्ली से अलग जरूर है, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका यहां भी निर्णायक होगी। मुख्यमंत्री का फैसला स्थानीय स्तर पर नहीं, बल्कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा तय किया जाएगा, जिसमें जातीय, क्षेत्रीय और राजनीतिक संतुलन को ध्यान में रखा जाएगा। अगर पार्टी को लगता है कि नया चेहरा राज्य में बेहतर संदेश देगा, तो शुवेंदु अधिकारी को दरकिनार भी किया जा सकता है।
